ओ शीत से आविष्ट निशा के घोर तिमिर, व्योम के पथ, इस शुक्ल पक्ष लौटा वह एक बार फिर ! लेकिन, क्या कौतुक ? पीतवर्णी हिमाशिक्त रश्मियों के उतप्त होने का भ्रम, चतुर्दिश व्याप्त शीतलता […]