Author: Laljee Thakur

  • मुक्तक

    न मैं तुलसी जैसा हूँ ,और न मैं खुसरो जैसा हूँ,
    मेरी कल्पना अपनी है ,सच नहीं दुसरो जैसा हूँ ।

    हम सभी एक ही ग्रन्थ के ,हाँ हर पन्नो सिमटे है,
    छन्दों में जो सिमट जाऊ तो,सुंदर बहरो जैसा हूँ ।।

    लालजी ठाकुर

  • हक़ मेरी माँ को होता

    हक़ मेरी माँ को होता

    “हक मेरी माँ को होता”

     

    मेरी तकदीर में जख्म कोई न होता,

    अगर तकदीर बनाने का हक मेरी माँ को होता,

     

    मेरी तस्वीर पे आज धूल न होता,

    अगर तस्वीर पोछने का हक मेरी माँ को होता,

     

    मेरी आँखों में अश्क आया न होता,

    अगर आँख सजाने का हक मेरी माँ को होता,

     

    मेरी तकफिन में कोई वहम न होता,

    अगर तकफिन बनाने का हक मेरी माँ को होता,

     

    मेरी इमारत दुःखो से भरा न होता,

    अगर इमारत भरने का हक मेरी माँ को होता,

     

    मेरी नसीहत कोई फर्मान न होता,

    अगर नसीहत देने का हक मेरी माँ को होता,

     

    मेरी मुअल्लिमा का ऐसा तक्रिर् न होता,

    अगर मुअल्लिमा बनने का हक मेरी माँ को होता,

     

    लालजी ठाकुर दरभंगा

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