Author: Sumit Singh

  • किरदार

    खुद की भावनाओं से रिश्ता टूटता रहा,
    एक नया किरदार अंदर ही अंदर बनता रहा।

    रिश्तों से रिश्तों तक का सफर तय होता रहा,
    एक नया किरदार अंदर ही अंदर बनता रहा

    कभी रोशनी तो कभी अंधेरो से रिश्ता गहरा होता रहा,
    एक नया किरदार अंदर ही अंदर बनता रहा।

    खुद के वजूद के साथ एक नया वजूद पिरोता रहा,
    एक नया किरदार अंदर ही अंदर बनता रहा।

    कभी किरदारो को तो कभी श्रोताओ को अपना मानता रहा,
    एक नया किरदार अंदर ही अंदर बनता रहा।

    हार से जीत जीत से हार का सफर करता रहा,
    एक नया किरदार अंदर ही अंदर बनता रहा।

    एक कलाकार एक किरदार को अपना मानता रहा,
    इस रिश्ते को दिल से निभाता रहा,
    एक नया किरदार अंदर ही अंदर बनता रहा।

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