Author: udta mann

  • ‘विकर’ सा प्रेम।

    प्रेम की भाषा, ना स्वरूप ना रूप
    बस एक भाव! जो कभी हमने जाना,
    पर कभी जाना ‘ही’ नहीं।
    प्रेम की माया, प्रेम की काया,तुमने भी सीखी और हमने भी पढ़ी,
    पर पढ़ कर भी हम ‘निरक्षक ‘
    और जान कर भी मन जाना ‘ही ‘ नहीं।

    माना भाव कुछ ऐसे थे;
    दिन में रात, रात में तुम,
    और तुम में हम कुछ खोये से थे।
    सपनो में तुम, ख्यालो में तुम,
    ओर तुम्हारे लिए हम रातो को रोये भी थे।

    अभाव है अब प्रेम का जीवन मरण, साँसों में
    भावो में, रातो में।
    अभाव है अब प्रेम का कल्पनाओं मे।
    ‘विकर्’ है जीवन का, बिना प्रेम के
    बिना ‘गुरु’ के।
    जो सिखा सके प्रेम या फिर
    प्रेम के बिना जीवन।

    ‘निरकर’ सा जीवन और ‘विकर’ सा प्रेम।
    शब्दों के झरोखे और रातों का मेल
    कुछ शब्द तुम्हारे हो और कुछ शब्द हमारे,
    संग चल प्रेम के, चलो
    क्यों ना ये जीवन सवारे!

    शब्द तुम्हारें भी अधूरे हैँ और बातें मेरी भी।
    तो क्यों ना तुम्हारे शब्दों के मोतियों से,
    ‘हमारी’ बातों के अर्थ निकाले।

    तुम्हारे शब्दों के झरोके से
    कुछ शब्द हमने संभाल के रखे हैँ।
    जब वफ़ा की बातें सुनते हैँ,
    तो तुम्हे याद कर लेते हैँ।
    साथ ही ‘विकार’ से प्रेम को भी
    जो था तुम्हारे और मेरे बीच
    किसी बहती नदी के समान,
    जिसका अंत जरूर समंदर मे जाकर है,
    पर उसमे पानी हमेशा से है।

New Report

Close