Author: Vaibhav

  • Ek Kavi….

    अभी थोड़ा कच्चा हूँ, दिल का मैं सच्चा हूँ,
         कवियों की महफ़िल मैं एक छोटा बच्चा हूँ|
    लिखे है कई ग्रन्थ कवियों ने दुनिया पर,
         अब कुछ पंकितियां मैं कवियों पर लिखता हूँ|

    लाखों अरमानो और ख्वाबो को पालते हैं,
           अपनी भावनाओ को शब्दो मैं ढालते है|
    न दौलत न शोहरत न तवज्जो चाहते हैं,
           बस अपनी सोच को आप तक पहुचाना चाहते है|

    लिखते हैं, पड़ते हैं, पड़कर मिटाते हैं,
           फिर कुछ सोचकर आगे बढ़ाते हैं|
    गाते हैं, सुनते हैं और गुनगुनाते हैं,
           इस तरह कवी अपनी कविता बनाते हैं|

    ज्वलनशील मुद्दों को हंस कर बताते हैं,
           हँसते हँसते वो कटाक्ष कर जाते है|
    शब्दों का संग्रह नहीं सोच का सागर है|
           सागर की बूंदों से वर्षा करते हैं

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