vivek netan, Author at Saavan's Posts

ज़िंदगी

ज़िंदगीज़िंदगी Tragedy 1 मिनट 273 0 vivek netan © Vivek Netan Content Ranking #3171 in Poem (Hindi) #305 in Poem (Hindi)Tragedy कुछ इस तरह से मुझ से नाराज़ हो गई ज़िंदगी गाँव की खुली गलियों से शहर ले आई ज़िंदगी छूट गई पीछे कहीं वो ठंडी खुशगवार सी हवा आसमां को ढके धूल के बादल में ले आई ज़िंदगी वो रातों की नींद वो सुकून प्यारी सी सुबह का दो पैसों के लालच में सब कुछ बेच आई ज़िंदगी हर तरफ दोस्त थे रिश्तेदार... »

भेड़िए और हिरणी

वो कोई जंगल या कोई सुनसान गली ना थी भीड़ का मंजर था और वो भी अकेली ना थी भीड़ से ही निकला था इक झुंड भेड़ियों का उनके लिए वो शिकार थी कोई लड़की ना थी भागी वो इधर से उधर किसी हिरणी की तरह मगर चक्रव्यूह से भागने की कोई जगह ना थी हुई तो थी थोड़ी बहुत उस भीड़ में हलचल मगर वो इंसान थे जिनमे इन्सानियत ना थी चिल्लाती रही, भेड़िये ले गए उठा कर उसे बहरों की भीड़ ने उसकी आवाज़ सुनी ना थी सब ने सोचा छोड़ो हमें क्या ... »

लाइफ इन सिटी

थकी – थकी – सी है यह बेज़ार ज़िंदगी अब इसे थोड़े आराम की ज़रूरत है पसीने – पसीने हो गई है जल – जल के इसे ठंडी सुहानी शाम की ज़रूरत है ! अरसा हो गया है अपनों से मिले हुए फिर होली या दिवाली की ज़रूरत है ! अकेले हैं हम हज़ारो की भीड़ में हमसफर की नहीं अब साथी की ज़रूरत है ! आवाज़ें तो रोज़ ही सुनता हूँ अपनों की अब सामने बैठ के बतियाने की ज़रूरत है ! “हेलो ! हाय !” – से ... »