Author: Manoj Kumar

  • जिसे भूलना अब तो नामुमकिन है

    जिसे भूलना अब तो नामुमकिन है

    वो लड़की सोलह की
    बातें सत्रह की
    क्या अजीब थी वो,
    पर नसीब थी वो,
    जिसे भूलना अब तो नामुमकिन है

    लहज़े बड़े नाज़ुक से थे
    खनकती हर आवाजे उसकी
    वो बोल भी दे गर दो टूक तो,
    खिल उठता दिल झूम के
    चाबुक सी जुबां उसकी
    नरम कलेजे की ठंडक- सी
    लगे सौ चाँद से रौशन थी
    जिसे भूलना अब तो नामुमकिन है

    वो मौसमी ताज़ी हवा
    थी मेरी वो ऐसी दुआ
    जिसे रखा छुपाके दिल में
    उसके हरेक मुश्किल से
    कभी ऐसी दूरी न थी
    अरे वो बड़ी भोली – सी थी
    कहने से उसके मैं बहक जाता
    ऐसी वो वहम – सी थी
    कभी मेरे लिए वो गुनगुनाती
    रिंगटोन दिल के वो सुनाती
    ऐसा जांचता दोनों का मौसम
    कम रहते गम और उलझन
    जिसे भूलना अब तो नामुमकिन है

    वो कभी कड़वी कभी मीठी – सी बातें
    करती रहती दिन और रातें
    सुबह की बाते उसकी अच्छी
    लगती मुझे उठने से पहले
    ऐसी वो मासूम- सी लड़की
    जिसे जगाता मैं फोन करके
    पर उठती कहाँ वो मुझसे लड़ती
    जिसे भूलना अब तो नामुमकिन है

    दूब पर नंगे पाँव चलके
    जाते बतियाने यूँ ही खुल के
    कई बहाने निकाल ही लेते
    ऐसा उस पे जान छिड़कते
    क्या जाने वो मगरूर लड़की
    जो रहती थी वो अकड़ी-अकड़ी
    जिसे भूलना अब तो नामुमकिन है

    मनोज कुमार यकता

  • जिन्दगी उम्र भर की सहेली है

    जिन्दगी उम्र भर की सहेली है
    एक उलझी हुई पहेली है
    दरिया है ये समंदर की पूछो न तुम
    फिर भी प्यासी है ये अकेली है
    कहो चाहे इसको काँटो का वन
    कर सको तो करो ये पार तुम वन
    रहना तो है इसके संग हरदम…
    कहाँ जाओगे छोड़ इसको तुम
    ये राग है उस रागों की रागिनी
    जो तपते है होठों पे ले दामिनी
    ये मासूम है और चँचल भी ये..
    जो चमकती है बनके ये चाँदनी
    ये करुणा है प्रिय और प्रितम भी है
    रहना साथ है इसके ये गम भी है
    ये सरल है सहज कठिन भी है…
    ये बहारों के हँसते मौसम भी है.

    मनोज कुमार यकता

  • ओ देस से आने वाले बता

    ओ देस से आने वाले बता

    ओ देस से आने वाले बता…
    क्या लाए हो मेरी ऐसी ख़बर
    जो झूम उठे दिल के मंज़र
    और दिल हो ये बेखबर…
    क्या अब भी वहाँ की गलियों में
    खुशबू वतन की आती हैं
    क्या अब भी वहाँ की हवाएँ में
    वैसे ही ठंडक भाती हैं
    क्या अब भी वहाँ की बरखाएँ
    छम छम आवाजें लगाती है
    ओ देस से आने वाले बता…
    क्या लाए हो मेरी ऐसी ख़बर
    जो झूम उठे दिल के मंज़र
    और दिल हो ये बेखबर…

    वो बूढ़ी माँ खुश तो है
    जो लोरिया हमको सुनाती थी
    जब रोना आए खिलौने पे,
    तो यूँ चुप कर जाती थी
    फसलों के रौनक रंगो में
    जवान है क्या उमंगों में
    क्या उस पे किरने पड़ती हैं
    और लालिमा होती जाती हैं
    मेरे हाल पे रोने वाले
    क्या अब भी वहाँ रोते हैं
    क्या शामों की हथेली पर वैसे
    रंगीन नजारे मिलते हैं
    क्या अब भी शफ़क़ के सायों में
    दिन रात के दामन मिलते हैं
    ओ देस से आने वाले बता…
    क्या लाए हो मेरी ऐसी ख़बर
    जो झूम उठे दिल के मंज़र
    और दिल हो ये बेखबर…

    क्या ये वर्दी के चेहरे भी
    वो भूल कभी ना पाती हैं
    जिस आँख से आँसू बहते हैं,
    उस आँसू को छुपाती है
    जो छोड़ के आए घर अपने
    वो दीवारे भी पुकारती है
    उनके भोली सूरत पे,
    क्या अब भी हँसी वो आती हैं
    जो कहती सर रख के दिल पे,
    क्या वो मुझको याद करती हैं
    ओ देस से आने वाले बता…
    क्या लाए हो मेरी ऐसी ख़बर
    जो झूम उठे दिल के मंज़र
    और दिल हो ये बेखबर

    मनोज कुमार यकता

  • वो पान की दुकान वो बरगद की छाँव

    वो पान की दुकान वो बरगद की छाँव

    वो पान की दुकान वो बरगद की छाँव
    जहाँ हम मिले..
    क्या याद है तुम्हें वो बारिश के छीटें
    लब पे तेरे जो गिरे
    सनसनाती हवाएँ वो ठंडी पुरवाई
    बदन पे तेरे जो चुभे….

    क्या याद है तुम्हें वो,
    आहों पे आहें भर के मुझसे
    मंगाई थी कुछ चटपटे..
    हाँ.. वो तन भीगा, मन भीगा
    आया जब दौड़ के पास तेरे…

    ठंडक – सी ठंडक की बातों में आके,
    लर्जे जब होठ तेरे
    क्या याद है, वो गलियाँ और गलियों में हम दोनों
    थे कुज्जे में हाथ धरे

    वो साँसों की खुशबू बहकी निगाहें
    मिले हमनशी को, नसीब कहीं
    पैदल चलना, चलके फिसलना
    फिर झुक जाना ऐसे, जैसे कोई शरारत करें
    वो मौसम बेगाने, थोड़े दीवाने
    प्यार से वो यूँ आहट भरे..

    वो चाट वो ठेले,
    वो बात झमेले
    कहाँ है वो मेरे
    कहाँ है वो तेरे
    जो हम है अकेले
    जो हम है अकेले….

    -मनोज कुमार यकता

  • मैं तेरे बाद हूँ

    मैं तेरे बाद हूँ

    तू मेरे पहले,
    मैं तेरे बाद हूँ
    ये शर्त भी है हार जीत
    कौन किसके साथ है
    जज़्बात से छूटकर,
    लब खोल बोल तू
    ये हालात किसके साथ
    कौन अब आजाद है
    इश्क भी एक रस्म है
    निभा सको तो थाम लो
    ये कौन है किसके लिए
    यह भी तो जान लो
    जिन्दगी बड़ी दूर की
    ये समझ कर छोड़ दो
    क्या करना है ये तय करो
    राह अपनी मोड़ लो

    -मनोज कुमार यकता

  • काव्य में कवि मर गया

    काव्य में कवि मर गया

    काव्य में कवि मर गया,
    जब दुनिया उसे बेवफ़ा कह दिया,
    कोई रत्जगे क्यों करेगा इस मुर्दे पे,
    उसका जिस्म भी अब मिट्टी हो गया।

    साँसें धुआँ है उसकी चाह में,
    लिखता रहता है हर पंक्ति याद में,
    वो मिले या ना मिले परवाह बगैर,
    जिन्दा रहता है सिसक कर…

    कवि तो खुद वैसे ही नाजुक पुतला है,
    छूने से खुदा बन जाता है,
    अब और क्या तड़पाएँगे उसे जमाने वाले,
    वो खुद तड़पा है इश्क में,
    तब पाए उसे रुलाने वाले।

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