हाइकु

होली में

होली में होगी ना अबकी हुरदंग। ना पानी ना कीचड़ ना दारु ना भंग खुशियाँ हीं खुशियाँ प्यार का रंग ।। »

सूक्ति

मात पिता की कर वंदन। सेवा सतत सहित निज तन मन धन। होवे आयु बल विद्या यशवर्द्धन ।। »

श्याम छवि

शीश जटा एक बेणी लटकत लटकत लट लटकन मुखचंद्र पे वारिद ऐसे लुकछिप खेल करत हो जैसे।। »

ममता की मूरत

जिसकी सबको बड़ी जरूरत है अगली पगली जैसी तैसी दिल की खूबसूरत माँ ममता की मूरत है ।। »

पहचान

अगर मैं होती गरीब किसान की उपजाऊ भूमि बंजर होने पर जरूर दुत्कार दी जाती मैं होती कुमार के चाक मिट्टी उसी के दिए आकार में ढल जाती मैं होती माली के बाग का फूल मुरझाने के लिए गुलदस्ते में छोड़ दी जाती मैं होती किसी महल की राजकुमारी विवाह के बाद छोड़ उसे मै आती कहने को तो होती मै लक्ष्मी घर की पर अलमारी के लॉकर की चाबी बनकर रह जाती चाहे चिल्लाऊं मै खूब जोर से फिर भी मन की व्यथा ना कह पाती चाहे मैं होत... »

SHAYARI

तेरी देहलीज टपने खातिर काफी दिनों से कुछ किया ही नहीं। ऐसा लगा मानो  जिंदा रहके भी इस दौरान  मैं जिया ही नहीं। »

गुज़री……..

ज़िन्दगी तो हमारी गुज़री…. मगर, गुज़र…..गुज़र…..कर गुज़री….. ……………..!!                                                   …………………D K »

हाइकु

डूबती नाव अंबर सागर में दूज का चाँद। पिघल-रहा लावा दिल अंदर आँखें क्रेटर । सिसकी हवा उड़ चल रे पंछी नीड़ पराया । यादों के मोती चली पिरोती सुई हार किसे दूँ। आसमान ने डाले तारों के हार घरों के गले। चौथ का चाँद सौत की हंसुली-सा खुभा दिल में। गया निगल एक पे एक गोटी कैरम बोर्ड। – Atul »

कविता

कविता

चलो चले … किसी नदी के किनारे किसी झरने के नीचें | जहाँ तुम कल कल बहना झर झर गिरना और… और मैं मंत्रमुग्ध हो झरनों की लहरों की अंतर्धव्नि से राग लेकर लिखता जाऊँगा | चलो चले… किसी उपवन में या कानन में ! वहाँ तुम कोयल से राग मेल करना या पपीहे के संयम को टटोलना और मैं उन संवेदनाओं की लडी अपनी कविता रूपी माला में पीरो कर तुम्हारा श्रृंगार करता रहुंगा | चलो चले… सागर के तट पर तुम ... »

कविता

” मै ही तो हूँ- तेरा अहम् ………………………….. मै ही तो हूँ तुम्हारे अंतरात्मा में रोम रोम में तुम्हारे | मैं ही बसा हूँ हर पल तुम्हारे निद्रा में जागरण में | प्रेम में घृणां में उसांसो से लेकर तुम्हारे उर्मियों तक | मैं हूँ बस मैं ही हूँ न पुर्व न पश्चात तेरा कोई था न होगा | एक मेरे सिवा तुम्हारे एहसास के परिसीमन के दायरे का कोई अंत नही. औ... »

कविता

चलो चले … किसी नदी के किनारे किसी झरने के नीचें | जहाँ तुम कल कल बहना झर झर गिरना और… और मैं मंत्रमुग्ध हो झरनों की लहरों की अंतर्धव्नि से राग लेकर लिखता जाऊँगा | चलो चले… किसी उपवन में या कानन में ! वहाँ तुम कोयल से राग मेल करना या पपीहे के संयम को टटोलना और मैं उन संवेदनाओं की लडी अपनी कविता रूपी माला में पीरो कर तुम्हारा श्रृंगार करता रहुंगा | चलो चले… सागर के तट पर तुम ... »

कविता

अब और परीक्षा नही… अब और परीक्षा नही प्रतिक्षा नही करेंगे | किया नही पर प्रीत हो गई उल्टी जग की रीत हो गई | और तितिक्षा नही वरेंगे || यह अपराध किया ईश्वर ने जिसने रचा तन मन मानव का | जिसने प्रीत और बैर बनाया ओ न सहे तो हम क्यों सहेंगे !! अब और परीक्षा नही सहेंगे प्रतिक्षा नही करेंगे | जब तक प्रीत नही थी बैरी ये कब था संसार ! इसे नही क्यों भा सकता दो पुण्य पथिक का प्यार !! हम कैसे है हम ही जा... »

कविता

” मन के मोती…” पानी के बुलबुले से माला के मोतियों से बिखरता है टूट जाता है | बनता है मन का मोती बन कर के फूट जाता है || स्वप्नों में साथियों से मिलना बिछड भी जाना ! समझा नही मै अब तक जो साथ ही सोया है ओ साथ छूट जाता है | कुछेक क्षंण में ही मन अंदर से टूट जाता है || फिर देखकर जठर भी उलझन में है फंस जाता ! आखिर ये स्वप्न में क्यों ये तथ्य है दिखाता !! जो कल्पना में पाते स्वप्नों मे... »

कविता- संवेदना

कविता- संवेदना… तू कौन है ..! तू कौन है..! संवेदना ! जो अनछुए अनदेखे पहलुओं को एकाएक होने का आभाष कराती है ! तू कौन है..! जो दूसरे की पीडा का उद्विग्नता का बोध कराती है ! तू वही तो नही … जो दूसरों की तकलिफों में आँखे नम कर जाती है ! तू वही बस वही है न ! जो बिना बोले अकारण ही मन को उदास अवशादित और हर्षादित कर जाती है ! तू वही तो नही जो विभत्सता के प्रति घृणां के रूप में अवांछनीय रूप में... »

कविता

तू कौन है ..! तू कौन है..! संवेदना ! जो अनछुए अनदेखे पहलुओं को एकाएक होने का आभाष कराती है ! तू कौन है..! जो दूसरे की पीडा का उद्विग्नता का बोध कराती है ! तू वही तो नही … जो दूसरों की तकलिफों में आँखे नम कर जाती है ! तू वही बस वही है न ! जो बिना बोले अकारण ही मन को उदास अवशादित और हर्षादित कर जाती है ! तू वही तो नही जो विभत्सता के प्रति घृणां के रूप में अवांछनीय रूप में स्वयं ही उत्पन्न हो ज... »

फूलों से सीख लो

फूल से  सीख लो यारों  जीवन  का  फलसफा,  कांटों में भी मुस्कुराने का अंदाज बयां करते हैं।                                                     जिज्ञासु  »

वक़्त का तमाचा

वक़्त का तमाचा हाथ क्या पूछे »

किसकी हसरत कैसी हसरत

किसकी हसरत कैसी हसरत अपने तो दुखों को मिली बरकत उसे गुनाहगार कैसे कह दो सब थी अपनी ही वैसी हरकत »

जिल्द बिन किताब का

जिल्द बिन किताब का फूल बिन हिज़ाब का रातों का नहीं ख्वाब हूँ आफताब का »

न सही गम सही

न सही गम सही खुद बन मरहम सही »

उन्हें ज़िद थी न हारने की

उन्हें ज़िद थी न हारने की कारण बन गई हार का »

घर के अंदर घर नहीं मिलता

घर के अंदर घर नहीं मिलता कोई सुखनवर नहीं मिलता »

बिक गया वो शक्स भी

बिक गया वो शक्स भी जिसे हम सौदागर समझते रहे »

न सूरत में न सीरत में

न सूरत में न सीरत में सब कुछ मन की जीनत में »

कहाँ गई वो हवाएं

कहाँ गई वो हवाएं कहाँ गई वो फ़िज़ाएं बिखर गई अब वफ़ाएं »

हर किताब की कहानी

हर किताब की कहानी पन्नो की मेहरबानी »

सब कुछ वैसा ही

सब कुछ वैसा ही सब कुछ पैसा ही »

वीराना अपना

वीराना अपना वीराना बेगाना वीराने को कौन जाना »

चलो फिर बांट ले

चलो फिर बांट ले गम को फेक डाले खुशिओं को छांट ले »

वफ़ा क्यों ढूँढ़ते हो

वफ़ा क्यों ढूँढ़ते हो गुमी हुई है गुमी रहेगी »

दर्द के पंजों में

दर्द के पंजों में दर्द है »

क्या लिखता है

क्या लिखता है सब दिखता है इंसा बिकता है »

वो जलते क्यों है

वो जलते क्यों है क्या शमा से रिश्ता है »

कोई अजनबी

कोई अजनबी छोड़ जाता आवाज़ दबी »

जो उसकी तमन्ना

जो उसकी तमन्ना बाकि फिर क्या करना »

कोई रहबर नहीं

कोई रहबर नहीं कोई सहर नहीं अपनी भी खबर नहीं »

नीले सपनो में

नीले  सपनो में काले से है शुमार अपनों में »

उसने की थी शुरू लड़ाई

उसने की थी शुरू लड़ाई मात मैंने भी कभी न खाई »

वक़्त पकड़ता लम्हा

वक़्त पकड़ता लम्हा इस दुनिया में हर इंसा तनहा »

जंग इंसानियत की

जंग इंसानियत की इंसान हो रहे लुप्त »

उसके क़दमों की चाप

उसके क़दमों की चाप सनाटों को रौंद गई चुपचाप »

नफरतें बेहिसाब

नफरतें बेहिसाब पहने नक़ाब निकलते जनाब »

कौन आया

कौन आया कौन गया यही दुनिया »

दिखते तो अब जो कभी

दिखते तो अब जो कभी दिखाई देते पर  दिखने जैसे नहीं »

कुछ तो था खास

कुछ तो था खास कैसे कोई भूले था वो ख़ास »

कुछ गहने

कुछ गहने मैंने देखे सपनों ने पहने »

कितना गहरा

कितना गहरा रिश्तों से समुंदर में सहरा »