वारिस था एकलौता उसका,
नाजो से पाला था उसने,
दी थी शिक्षा अच्छी उसकी,
क्या क्या जतन किए थे उसने,
लायक आदमी बनाने के लिए उसे,
मालूम क्या था उसे,
जाकर विदेश भूल जाएगा उसे,
दिलासा तो दिया था उसने,
ले जाऊंगा एक दिन मैं तुझे,
इंतजार वो करती रही,
पति तो पहले ही चल बसे,
अब बारी थी उसकी,
वह कहती रही उसे,
मुझे वृद्दाआश्रम में रखो
या खुद ले जाओ,
दिलासा देता रहा बेटा,
मां मैं आऊंगा एक दिन,
वो इंतजार करती रही,
पर बुढी हड्डी ने दे
दिया था जवाब,
पता तो तब चला,
जब बेटा आया एक साल बाद,
टूटी फूटी कंगाल थी वह,
साड़ी में लिपटी हुई,
है यह कलयुगी बेटे की दास्तान |