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हे मानस सुत , मात धरणि के,
क्यों निज कुटुंब से बैर करे।
पीर हरण न कर सके स्वजन जो,
तो क्यों शीर धर धारण तेज़ किए।
दिया अमिट है, घाव रक्तपात से,
लिया न सुध निज अभिमान में ।
कैसे करूं आभार व्यक्त माँ धरणि की,
‘आभारी’ शब्द बिन जिह्व हुए।
ना समझो सरस बात ये कोरी,
समेटे कितने हैं राज़ ये काल के हाथ धरे।
अगर पुष्प की चाह हुई तो,
काटों से हाथ डरे ना डरे ।
मिले पुष्प रुपी अभिलाषा या,
कुछ अहित नवीन खिल मधुर पड़े।
धन्यवाद उस मात धरणि को ,
जिनकी कोख, आँचल में पले बढ़े।
हो सके भले ही ना भला मात का तो भी,
मन मलिन अंतर्रुदन कर आभार करे।

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