Site icon Saavan

मेरी आँखों से

मेरी आँखों से इतना बहा है तू,
देखूँ मैं जिस जगह, वहाँ है तू।

मुबालग़ा1 नहीं है ये मोहब्बत का,
मुत्तसिल 2 है मेरा मकाँ, जहाँ है तू।

कैसे देखोगी तुम दर्द का मंज़र,
खुली नहीं अभी वो निगाह है तू।

खोये हुए हैं हम ख़ल्क़3 में कहीं,
भटके हुए इश्क़ की पनाह है तू।

क्या गुज़री है तेरे बाद क्या बताऊँ,
मैं मर गया, मुझमें बस रहा है तू।

1. अतिशयोक्ति; 2. नज़दीक; 3. दुनिया।

 

यह ग़ज़ल मेरी पुस्तक ‘इंतज़ार’ से ली गई है। इस किताब की स्याही में दिल के और भी कई राज़, अनकहे ख़यालात दफ़्न हैं। अगर ये शब्द आपसे जुड़ पाए, तो पूरी किताब आपका इंतज़ार कर रही है। – पन्ना

Exit mobile version