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parchai

यूँ तो रोज़ खडी
होती हु उस सूखे किनारे पर
तेरा और उस धुप ढलने का इंतज़ार करती हु
इंतज़ार करती हु मेरी उस परछाई का
जो धुप ढल जाने के बाद
कोई दूर देश से घूम के आती हें
और जोर से थराके लगाकर
मुझे मुझसे ही जोड़कर
अगली सुबह उन् धुप की किरणों में मील जाती हें
घुल जाती हूं उन यादों में
जिसको रोज़ याद करती हुं
और फिर दुपहर ढलते ही
आजाती हु सूखे किनारे पर
और सुकून की तालाश करती हूं

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