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शजर सूखा है

शजर1 सूखा है, खिज़ाँ2 अरसे से ठहरी है,
लगेगा वक़्त कुछ और, चोट ज़रा गहरी है।

लगता है एक और बम पड़ेगा फोड़ना,
सुना है सरकार यहाँ की ज़रा बहरी है।

मायूस मख़्लूक़ 3 को हँसाए हम तो कैसे,
हर किसी के लबों पे खड़ा इक पहरी है।

बर्बादियों का सिलसिला यूँ ही चलेगा यहाँ,
जब तक है ज़मीं पर खींची ये लकीरी4 है।

अचानक आकर झोंके ने घूँघट उठा दिया,
माफ़ कर दो इसे ज़रा, ये हवा शहरी है।

पूछते-पूछते मेरी लापता जिंदगी का पता,
मौत भी आकर मेरे शानों5 पे आ ठहरी है।

अकाल में सूख गई है, हर जिंदगी गाँव की,
फाइल बाबू की मगर, अभी भी सुनहरी है।

1. पेड़; 2. पतझड़; 3. दुनिया के लोग; 4. विभाजन की रेखा; 5. कंधों।

 

यह ग़ज़ल मेरी पुस्तक ‘इंतज़ार’ से ली गई है। इस किताब की स्याही में दिल के और भी कई राज़, अनकहे ख़यालात दफ़्न हैं। अगर ये शब्द आपसे जुड़ पाए, तो पूरी किताब आपका इंतज़ार कर रही है। – पन्ना

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