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जीवन के इस मोड़ पर

मेरे बच्चे साथ निभाओगे
गर गुस्सा हो जाऊं किसी बात पर
आकर मुझे मनाओगे ?
इन सिकुड़न वाले हाथों को
क्या प्यार से तुम सहलाओगे?
बूढ़ा हूं कुछ , सुनने की शक्ति भी क्षीण हुई
कोई बात समझ गर ना आए
क्या बार-बार दोहराओगे ?
ताउम्र सभी के साथ रहा
इस बात को क्या भुला दोगे।
गर घर छोटा पड़ गया तेरा है
क्या वृद्धाआश्रम भिजवा दोगे?
तेरी चांद सी रोशन दुनिया में
माना कुछ बेरंग सा हूं
जीवन की ढलती बेला में
आखिर तेरे बच्चे जैसा हूं।।
-Kanchan dwivedi

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