संपादक की पसंद

बेटी हुई पराई

बेटी हुई पराई देखो बेटी हुई पराई, यह कैसी ऋतु आई देखो बेटी हुई पराई मेरे आंगन के पौधे की डाली बड़ी ही नाजुक नाजुक सी वह थोड़ी नखरेवाली, मेरे आंगन में जब वह आई मुझे लगी बहुत ही प्यारी मेरे मन को बहुत सुहाई आज विदाई की इस बेला में, देखो आंख मेरी भर आई मेरी आंखों से मोती बरसे ये मोती मैं तुझ पर वारूं, आजा तेरी नजर उतारूं बेटी जो चाहे सो ले जा पर एक चीज मुझे भी दे जा, यही छोड़ जा अपने नखरे कहीं किसी क... »

मंगलसूत्र; सुहाग का प्रतीक

मंगलसूत्र को सुहाग का प्रतीक माना जाता है जाने क्यों ऐसा कहा जाता है?? बचपन से यही सोंचती थी मैं पर आज देख भी लिया अपनी आँखों से; एक विधवा स्त्री के सामने आने पर लोगों ने उसे अशुभ ठहराया ताने उसको मार-मार कर फौरन वहां से उसे भगाया तभी सामने से कुछ सुहागन पूजा को सज-धज निकलीं लोग उन्हें देखकर सुखी थे मन ही मन निश्चिंत हुए थे कि विधवा स्त्री को देखने के बाद कुछ तो अच्छा शगुन हुआ मंगलसूत्र और सुहाग क... »

दहेज प्रथा एक अभिशाप

दहेज प्रथा एक अभिशाप ********************** बूढ़ा बाप अपनी पगड़ी तक निकालकर दे देता है और माँ अपने कलेजे का टुकड़ा पर फिर भी नहीं भरता लोभियों का मन जाने क्या लेना चाहे वो ? समझते क्यों नहीं इस बात को वह दुल्हन ही दहेज है कब समझेंगे जो तड़पाते हैं गैरों की लड़की को वह एक दिन अपनी लड़की भी दूजे घर भेजेगें दहेद प्रथा है समाज का अभिशाप यह लोभी लोग कब समझ पाएगे हिसाब होगा अच्छे-बुरे कर्मों का वहां जब ... »

शहादत को नमन

शत्रु को तोड़ कर लेटा, तिरंगा ओढ़ कर बेटा भारत मां की हर मां का , सीना फटता जाता है जब किसी का लाल तिरंगा , ओढ़ के आता है बूढ़े बाप ने देखा जब, तो आंखों से आंसू निकल गए बोला मेरी लाठी टूटी, कैसे अब जिया जाए दो मासूम पूछे मां से, पापा क्यों खामोश से हैं हमें पुकारते भी नहीं है, नींद में क्यों आए हैं पत्नी का सिंदूर मिटा जब, मुंह को कलेजा आ गया बिंदी भी हटा दी उसकी, कंगन भी उतार दिया आंखें सबकी हो ग... »

मिठास बढ़ने दे

रागिनी गा दे या गाए बिना सुना दे भीतर है जो उबाल उसे बाहर निकलने दे। मन की जुल्फों को उलझने दे दिल की लगी को चारों ओर बिखरने दे। उसकी तपिश से बर्फ पिघलने दे। हिलोरे उठने दे, फलों की मिठास बढ़ने दे, अपनेपन का अहसास होने दे खुशी के आंसू रोने दे, अधखिले फूल खिलने दे। त्रिपुट में लगाने को जरा चन्दन घिसने दे, ठण्ड में अधिक ठंड का अहसाह करने दे, यूँ जकड़े न रह जरा हिलने-डुलने दे। »

**आज उसी वृद्धाश्रम में***

छोंड़ दो इस बुढ़िया को किसी वृद्धाश्रम में यह सुनकर मुझको थोड़ा गुस्सा आया एक दिन फिर तंग आकर पत्नी से वृद्ध माँ को आश्रम मैं छोंड़ आया रोया बहुत माँ से लिपटकर माँ का दिल भी भर आया माँ ने आँसू पोंछे अपने आंचल से और उनको मुझ पर प्यार आया बोली बेटा आते रहना अपने घर का भी खयाल रखना मत रोना मुझको याद करके मेरे लिए बहू से मत लड़ना मेरा क्या है मैं कब मर जाऊं तू रहना खुश और आते रहना यह कहकर माँ ने कर दि... »

जला दिया क्यों मुझको साजन ???

जला दिया क्यों मुझको ओ साजन! ऐसी क्या गलती कर बैठी थी मैं तो अपने सास-ससुर की पूजा देवों सम करती थी ननद को अपनी बहन की तरह मानती थी देवर को भैया कहती थी जला दिया क्यों मुझको साजन मैं तो तेरी धर्मपत्नी थी तुम जो कहते थे वो करती थी तुम्हारी ज्याती भी सहती थी देखा करती थी पराई स्त्रियों के संग में पर फिर भी मैं चुप रहती थी तेरी छाया देख के मैं घूंघट करके पीछे चलती थी जला दिया क्यों मुझको साजन ! मैं भ... »

अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों…

जख्म अपनों ने दिल पे हर बार कर दिये अपने ही शहर के बच्चों ने हम पर पथराव कर दिये दर्द उस दम बढ़ा मेरा ऐ हिन्दुस्तानियों ! जब हमारी कुर्बानी पर भी सियासत के शकुनि राजनीति के दांव चल दिये हम हिन्द के रक्षक हैं किसी पार्टी के भाड़े के टट्टू नहीं हम तो तिरंगे में लिपटकर उस पार चल दिये ये देश हमारा है और हम इसके सपूत हे युवाओं ! हम देश की बागडोर तुम्हारे हाथ में सौंपकर अब यार चल दिये…. »

‘आज तुमने मुस्कुराकर बात की’

आज तुमने मुस्कुराकर बात की कुछ रोने वाली और कुछ हँसने वाली बात की, अच्छा लगा मुझको तुम्हारा झगड़ा करना भी खुशी इस बात की है कि तुमने हमसे बात की… »

“अब दिल्ली दूर नहीं”

किसानों ने ‘अब दिल्ली दूर नहीं’ यह नारा सत्य कर दिखाया है पूरे देश को अपनी व्यथा से रूबरू करवाया है पर कुछ सियासत के घोंड़ो के कान पर जूं नहीं रेंगता है सारा देश देख रहा पीड़ित किसान पर सरकार को दिखाई नहीं पड़ता है पानी की बौछार करें कभी आँसू गैस का छिड़काव करें पर किसान के हौसले को कोई हथियार ना छलनी कर सके तुम डटे रहो बस अड़े रहो देखो अब दिल्ली दूर नहीं तुम्हारे साथ है देश की शक्ति त... »

गुरु-पर्व

संवत् 1526 29 नवंबर 1469 कार्तिक पूर्णिमा के दिन, पंजाब के तलवंडी गांव में गुरु नानक जी ने जन्म लिया जाना गया ये नाम ननकाना साहब नाम से, वर्तमान में है जो पाकिस्तान में सिख धर्म के प्रथम गुरु हैं आज इनका जन्म दिवस है, प्रकाश-उत्सव और गुरु-पर्व है पिता का नाम मेहता कालू था माता तृप्ता देवी थीं और बहन का नाम नानकी था विवाह हुआ 1485 में, पत्नी का नाम था सुलक्षिणी देवी दो पुत्र रत्न हुए नानक जी के श्र... »

ये कैसा कलयुग आया है ???

हे राम तुम्हारी दुनिया में ये कैसा कलयुग आया है…!! ************************* कहीं जल रहे दीप तो देखो कहीं अंधेरा छाया है हे राम ! तुम्हारी दुनिया में ये कैसा कलयुग आया है…!! तज रहे प्राण मानव देखो कटते जाते जंगल देखो बेघर होते पक्षी देखो सड़कों पर रोते बच्चे देखो देखो तुम मरते किसान को जीवित तुम रावण देखो बोया था तुमने जो बीज कभी उसमें फल देखो कैसा आया है ? हे राम ! तुम्हारी दुनिया में... »

हे क्षेत्रपाल..!!

मेरे देश के किसान ! मत हो परेशान यह बुरा वक्त भी टल जाएगा… जिसने जो बोया है वो वैसा ही फल पायेगा सुना तो होगा तुमने भी; बुरा वक्त सिर्फ हमारे सब्र का इंतेहान लेने आता है कुछ हानि कराता है तो कुछ सिखलाकर भी जाता है मत रो तुम, मत हो उदास तुम्हारे अश्कों से ना पिघलेगा पथ्थर दिल हे क्षेत्रपाल ! तुम लगे रहो बस डटे रहो मत रखना कदम अब पीछे तुम तेरे स्वेद और हिम्मत से तो यह अम्बर भी झुक जाएगा… »

*कसम से*

*कसम से* अब आप बिन रहा नहीं जाता किसी से कुछ कहा भी नहीं जाता हर पल आपकी कमी महसूस होती है हर दम अधूरी जमीं महसूस होती है कितनी भी मसरूफ़ रहूं, एक आहट सी आती है सूखे पत्तों सी बिखर जाती हूं तस्वीर तुम्हारी देख कर निखर जाती हूं आपकी यादें सुबह से शाम कर देती हैं, सच पूछो तो परेशान कर देती हैं यादों से कहो, यूं ना आया करें, हमें हरदम यूं ना सताया करें निशा का तीसरा पहर हो रहा है, देखो ना सारा संसार ... »

ऐ जाते हुए लम्हों…!!

ऐ जाते हुए लम्हों ! मुझको भी साथ में ले लो तुम संग मैं भी मिल लूंगा अतीत के मीठे सपनों से खो जाऊंगा मैं फिर से बिखरी-बिखरी जुल्फों में उन खुशबू वाली सांसों में एहसास अलग होता था मैं भूल जाता था सबकुछ जब पास में वह होता था ऐ लम्हों जरा ठहरो ! चलने दो संग में अपने जो अधूरे रह गये सपने पूरे करने दो, संग चलने दो… »

कविता : वो सारे जज्बात बंट गए

गिरी इमारत कौन मर गया टूट गया पुल जाने कौन तर गया हक़ मार कर किसी का ये बताओ कौन बन गया जिहादी विचारों से ईश्वर कैसे खुश हो गया धर्म परिवर्तन करने से ये बताओ किसे क्या मिल गया जाति ,धर्म समाज बंट गये आकाओं में राज बट गये आज लड़े कल गले मिलेंगे वो सारे जज्बात बंट गए || नफरतों की आग में यूँ बस्तियां रख दी गईं मुफ़लिसों के रूबरू मजबूरियां रख दी गईं जीवन से मृत्यु तक का सफर ,कुछ भी न था बस हमारे दिलों मे... »

वृक्ष कहे रोकर पृथ्वी से….!

वृक्ष कहे रोकर पृथ्वी से हे वसुधा ! मैं हूँ भयभीत बोया मुझको प्रेम से किसी ने रोपा और दिया आशीष पर जाने कब चले कटारी मेरे चौंड़े वक्षस्थल पर आज मैं देता हूँ छाया सबको और देता हूँ मीठे फल जाने कब कट जाऊं मैं भी अपने साथी वृक्षों सम रोंक सकूं मैं मानुष को मुझमें ना है इतना दमखम जला लकड़ियां मेरी जाने कितने घरों में बने भोजन मुझको ना काटो हे मानुष ! देता हूँ मैं तुमको आक्सीजन… शुद्ध करूं मैं वा... »

न दिखे

हमें मालूम होता अगर उनकी आदत है रूठ जाने की तो हम कभी परवाह ना करते इस जमाने की । तोड़कर दुनिया की सारी रस्में कसमें चले आते तेरे पहलू में दिल अपना रखने । अगर जिंदगी के सफर में आप मेरे संग होते तो इस तरह से मेरे ख्वाब ना बेरंग होते । उन्हें तलाशने में हम एक जिंदगी में सौ बार बिके घूंघट की आड़ से हर तरफ देखा उन्हें किसी ओर भी ना दिखे। वीरेंद्र सेन प्रयागराज »

जवां दर्द

तन्हाई के आलम में घुट-घुटकर जब दर्द जवां होता है चाहत में खिले फूलों का पत्थर पर निशां होता है । टूट कर बिखरने से पहले यूं बाहों में समेट लेते हैं जैसे धरती को समेटे सारा आसमां होता है। सच है कि दूर रहने से प्यार बढ़ता है चुप रहने की कसम खा कर भी राज ए इजहार बयां होता है। जवां दिल को तड़पने दूं या कुछ घड़ी आराम दे दूं सोचकर लम्हें मोहब्बत के वक्त पर गुमां होता है । नींद आती नहीं चैन भी खोया सा है ... »

*सोनू की चॉकलेट*

सोनू एक प्यारा बच्चा था, मन का बिल्कुल सच्चा था चॉकलेट खाने का मन करता था सोनू का पर मम्मी से वो डरता था इसीलिए सोनू चॉकलेट की, विंडो शॉपिंग करता था । दूर-दूर से देख के चॉकलेट, मन ही मन सोचा करता था बड़ा हो कर खाऊंगा चॉकलेट सुन्दर सपने बुनता रहता था टॉफी भी भाती थी उसको, पर कैडेबरी पर वो मरता था इसीलिए सोनू चॉकलेट की विंडो शॉपिंग करता था । *****✍️गीता »

अपना हक

क्यों दिल्ली आज हिल रही क्यों इतना डर रही वो ह़क लेने आ रहे जान की बाजी लगा रहे राह में कितने रोड़े अटकाओगे अब रोक नहीं पाओगे जितनी बंदिशे लगाओगे संघर्ष का उग्र रूप पाओगे क्या सुलगता रक्त देखा कभी क्या उलझता युद्ध देखा कभी यही तो दिल्ली को हिला रहा नही, वो डराने नहीं आ रहा आ बैठ,सुन उसकी बात बस वो अपना हक़ लेने आ रहा । »

क्या खराबी है कि मियां शराबी है

क्या खराबी है कि मियां शराबी है । शराबी की बीबी हूँ इसमें भी नवाबी है।। रोज पकौरे और सलाद दिखते घर में हो आबाद नल में पानी हो न बेशक़ मेज सजा शर्बते गुलाबी है। क्या खराबी है कि मियां शराबी है।। घर में इन्टरी होती जब करते खूब भले कोहराम। बच्चे सहमे-सहमे-से बिना नींद के करे आराम।। जूठी बासी भोजन को भी समझ रहा स्वादिष्ट कबाबी है। क्या खराबी है कि मियां शराबी है।। कुत्ते संग भी सो जाता है नशे में होकर... »

शिकवों के पुलिंदे….

यादों के पंख फैलाकर सुनहरी रात है आई उन्हें भी प्यार है हमसे सुनने में ये बात है आई पैर धरती पे ना लगते उड़ गई आसमां में मैं जीते जी प्रज्ञा’ देखो स्वर्ग में भी घूम है आई . चाँद पर है घटा छाई गालों पर लट जो लटक आई… सजती ही रही सजनी सजन की प्रीत जो पाई मिलन की आग में देखो जल गये शिकवों के पुलिंदे, पीकर नजरों के प्याले प्रज्ञा बन गई मीराबाई… »

‘प्रेम के उपनिषद्’

थक गई हूँ अब रोते-रोते, तन्हा राहों पर चलते-चलते इन बिखरी साँसों की अरज बस है यही तुमसे मिलन जब भी हमारा हो ना कोई गिला-शिकवा हो ‘प्रेम के उपनिषद्’ पर बस नाम अंकित तुम्हारा हो बिखर कर टूटने से पहले जब मिलना कभी हमसे, मुझी में डूब जाना तुम, फकत बाँहों में भरकर के… »

भूमिपुत्र का सम्मान करें

आज अन्नदाता किसान, राहों पर है परेशान देश को अन्न देता जो, भारत माँ की जो है शान क्यूं आना पड़ा उसे राहों पर, ये बात कर रही है हैरान अपने एक हक़ की खातिर, लड़नी पड़ी लड़ाई है आखिर ये हक़ है उसका, उसकी मेहनत की कमाई है भूमिपुत्र का सम्मान करें हम, उसकी आंखें ना होने दें नम आज आवाज़ आई है देखो, खेतों से उस हलधर की, जिसकी मेहनत की रंगत से, भूख मिटे है हर घर की *****✍️गीता »

आखिर ये है कैसा संताप

पति की गलती पुत्र की गलती गलती करे चाहे भाई-बाप। हर गलती पर रोए नारी आखिर ये है कैसा संताप।। अपराध नहीं करती कोई एक अपराधी की बन रहती। बस यही एक अपराध सदा अँखियाँ आँसू भर नित सहती।। ‘विनयचंद ‘ ममता नारी की कवच रूप जो पाकर। निज उत्कर्ष करे न न औरों का बने ठहर।। वीर नहीं कायर है जग में नारी को रुलानेवाला। नमकहलाल बनो विनयचंद नित नित नमक खानेवाला।। »

यह न कहो अवरोध खड़े हैं

यह न कहो अवरोध खड़े हैं, कैसे मंजिल को पाऊँ मैं, जहां-तहां बाधाएं बैठी कैसे कदम उठाऊँ मैं। यही निराशा खुद बाधा है जो आगे बढ़ने से पहले डगमग कर देती है पग को चाहे कोई कुछ भी कह ले। भाव अगर मन में भय के हों काली रात घना जंगल हो, कैसे पार करे मन उसको कैसे जंगल में मंगल हो। मंगल मन में लाना होगा भय को दूर भगाना होगा, चीर गहन अंधियारे को पथ रोशन करना होगा। हार गया मन तो सब हारा मन का ही यह खेल है सारा मन... »

“अनाथ आश्रम”

अनाथ आश्रम ★★★★★★★ मेरे माँ-बाप कैसे होंगे यही सवाल अक्सर मस्तिष्क में गूंजता रहता है अक्सर मुझे वो काकी याद आ जाती हैं जिन्होंने मेरी परवरिश बचपन में की थी उस अनाथ आश्रम में बहुत से बच्चे थे पर मुझसे कुछ अलग ही लगाव था उनका माँ नहीं थीं पर फिर भी माँ जैसा खयाल रखती थीं मेरा उस अनाथ आश्रम में कभी अनाथ जैसा महसूस नहीं होता था सब थे अपने से और दर्द समझते थे वो काकी आज बहुत याद आ रही हैं जिनकी गोद मे... »

“अतीत के फफोले”

अतीत के फफोले *************** जीवन मेरा उलझा-उलझा सुलझी लट बालों की मैंने ना देखा सुंदर उपवन ना देखी प्रेम की सरिता निर्मल भूलवश मैं पड़ गई प्रेम के मायाजाल में सोंचा था मिलेगा सुख और जीवन में खिलेेंगे सुंदर पुष्प पर हार ही हार मिली जो भी जीवन में आया उससे केवल पीर मिली अतीत के फलोले आज फूटने लगे हैं जब बिछड़े हुए लोग फिर से मिलने लगे हैं.. »

लावारिस बचपन

लावारिस बचपन ************** सड़कों पर भटक-भटक कर है कैसे बचपन बीता, और नहीं खाने को है एक निवाला मिलता… जाने कहाँ हैं मेरे माँ-बाप नहीं मैं जानू, मैं तो झुग्गी बस्ती को ही अपना घर-बर मानू… लालन-पालन मेरा अनाथ आश्रम में हुआ है, यह लावारिस बचपन सड़कों के किनारे ही कटा है… मैंने ना देखा सुनहरा बचपन ना देखी शोख जवानी, बस बचपन से करी मजूरी और गलियों की धूल है छानी… »

मुहौब्बत अगर आप सच में करें

मुहौब्बत अगर आप सच में करें तो मुहौब्बत में ईश्वर की छाया दिखेगी, दिखावा नहीं माँगती है मुहौब्बत, मुहौब्बत में सच की कहानी मिलेगी। सच्ची मुहौब्बत में धोखा करे जो, इंसान कहने के काबिल नहीं वो, रुलाये बिना बात के प्रिय को जो प्रीतम कहाने के काबिल नहीं वो। विश्वास सबसे बड़ा जिन्दगी में अगर हो न विश्वास फिर क्या मुहौब्बत, रखो एक – दूजे में विश्वास पूरा सच में उसे ही कहेंगे मुहौब्बत। न रोना है खुद... »

*देवोत्थान एकादशी*

कार्तिक मास की, शुक्ल पक्ष की एकादशी को देवोत्थान एकादशी आई है ये प्रबोधिनी एकादशी भी कहलाई है हर्षोल्लास साथ में लाई है आषाढ़ मास की, शुक्ल पक्ष की एकादशी को चार मास के लिए देव शयन को जाएं, शुभ-कारज भी ना हो पाएं देवोत्थान एकादशी पर देवों सहित नारायण निंद्रा से जागें शुभ-कारज भी होने लागें प्रारम्भ होवे हर शुभ काम, श्री गणेश हो लेकर हरि नाम पद्मनाभ विष्णु जी का होता है आह्वान पूजा-अर्चना की जाती ... »

महत्व

लड़की है तो क्या हुआ हम भी लिख पढ़ ले अगर दुनिया के दरवाजे खुलेंगे मिलेगी हमको भी डगर विद्या में है ताकत कितनी बात समझ में आ गई दुनिया के हर क्षेत्र में नारी आसमान सी छा गई पढ़ लिख कर हम उन्हें बताएं जो अब तक हैं अंधियारे में ज्ञान का दीप जला कर मन में अब आ जाओ उजियारे में खुद को समझो खुद को जानो कल कि शायद हस्ती हो तुम ना पढती ना लिखती तो दुनिया में रह जाती गुम खुल गई है आंखें अपनी पढ़ लिख कर हम ... »

“देवोत्थान एकादशी”

आषाण की एकादशी को सभी देव सो जाते हैं… और कार्तिक की एकादशी को सभी देव जग जाते हैं… इसीलिए इस दिन को देवोत्थान एकादशी कहते हैं… आज के दिन विष्णु जी चारमास के बाद नींद से जागते हैं… और आज के दिन तुलसी माता का विवाह भी होता है.. इसीलिए आषाण से कार्तिक मास तक कोई शुभ कार्य किया नहीं जाता है… आज के दिन से हिन्दू धर्म में विवाह होना प्रारम्भ हो जाता है… देवोत्थान एका... »

उस माँ का दर्द कौन जाने..!!

उस माँ का दर्द कौन जाने ! जो अपने फर्ज के लिए अपने दुधमुहे बच्चे को घर छोंड़कर जाती है.. वो पुलिसकर्मी है अपनी ड्यूटी खूब निभाती है… कभी छोंड़ती मायके में कभी ससुराल में छोंड़कर जाती है.. दिल को पथ्थर बनाकर ममता से मुंह मोड़ती है देश के नागरिकों की रक्षा के लिए अपने बच्चे को दूसरे के सहारे छोंड़ती है… कैसे बीतते हैं उसके दिन और कैसे रात कटती है… उस माँ का दर्द कौन जाने जो अपने बच... »

प्रेम

राहें हमारी मिलने के आसार नहीं हैं! कैसे कहूँ तुम्हारा इंतजार नहीं है!! मेरी हर दलील को ठुकरा चुका है ये! इस दिल पे मेरा कोई इख्तियार नही है!! ख़्वाबों में तुमसे रोज़ मुलाक़ात है मेरी! अफसोस हक़ीकत में ही दीदार नहीं है!! रूह के हर जर्रे में शामिल हो तुम ही तुम! और कहते हो लकीरों में मेरी प्यार नहीं है!! ©अनु उर्मिल ‘अनुवाद’ »

मेहनत

पसीना बहाना जरूरी है तेरा, तभी तो कदम लक्ष्य चूमेगा तेरा। सजग हो स्वयं को लगा श्रम पथ पर, सवेरा है जग जा, आलस्य मत कर। तेरी राह देखे खड़ी है बुलंदी कर ले तू मेहनत से अक़्दबंदी, निशाना लगा आंख पर मत्स्य के तू पायेगा पल-पल फतह सत्य की तू। परिश्रम का फल मिलेगा सभी को लगा पेड़, फल-फूल देगा कभी तो। कंटक रहित राह मेहनत होगी तेरी सफल चाह मेहनत से होगी। उलझन नहीं एक मंजिल पकड़ ले जाने न दे हाथ से तू जकड़ ले, न... »

झूठ से डरना नहीं (गीतिका छंद)

बात अपनी बोल देना, बात में डरना नहीं। धर्म की ही बात करना, धर्म से डिगना नहीं। तू अगर है सत्य पथ पर, झूठ से डरना नहीं। भूल कर भी बस गलत की तू मदद करना नहीं। सत्य के राही कभी डरते नहीं झुकते नहीं, तू अगर है सत्य पथ पर, फिर कहीं दबना नहीं। सिर उठा कर जोश से जीना, कभी गिरना नहीं, दूर हो सारी निराशा, हो हँसी, रोना नहीं। »

गजल- सोचा न था |

गजल- सोचा न था | ठुकरा देगा मुझे इस तरह कभी सोचा न था | दगा देगा मुझे इस तरह कभी सोचा न था | खुद से भी जियादा एतवार था मुझे उसपर | दफा कह देगा इस तरह कभी सोचा न था | हुश्न वाले पत्थर दिल होते कहते है लोग | दिल तोड़ देगा इस तरह कभी सोचा न था | दुनिया दिल बसाएँगे साथ थी तमन्ना मेरी | घर जला देगा इस तरह कभी सोचा न था | निगाहों मे प्यार होठो मुस्कान एक धोखा था | रुला देगा मुझे इस तरह कभी सोचा न था | मे... »

सूखे दरख्त रोते हैं क्यों

जहाँ सबसे पहले सूरज निकले वहाँ खौफ का मरघट क्यों जहाँ काबा -काशी एक धरा पर उस माटी में दलदल क्यों खून के आंसू रो रहे हैं क्रांतिवीर बलिदानी क्यों नेताओं की लोलुपता पर सबको है हैरानी क्यों नंगे सभी हमाम में दिखे सबकी एक कहानी क्यों || गाँधी और सुभाष के सपने जलते उबल रहे हैं क्यों महंगाई बढ़ रही निरन्तर बनी दुधारू गइया जनता क्यों फर्क हम में और सूरज में कहाँ है हमारी सहम सी विकल किरणें क्यों देश में ... »

चलो हार पर जीत पाने की सोचो (भुजंगप्रयात छंद में)

भरा दर्द है सब तरफ याद रखना सभी दर्द में हैं मगर याद रखना, भुला कर गमों को खुशी खोजना बस, तभी जिन्दगी में मिलेगा मधुर रस। न चिन्ता में रहना अधिक आप ऐसे, सदा मस्त रहना बच्चों के जैसे, चिन्ता तो केवल रोगों का घर है, चिन्ता से खुद को जलाना न ऐसे। हावी न हो पाएं गम कोई खुद पर, मनोबल रहे उच्च, कोई नहीं डर, चलो हार पर जीत पाने की सोचो, गमों को उड़ा दो, खुशी को ही खोजो। —— (भुजंगप्रयात छंद में... »

गज़ल -वो ठहरता नही है |

गज़ल -वो ठहरता नही है | बातो मे करता प्यार मगर दिल से वो करता नहीं है | वादे लाखो किए मगर जरूरत पर वो ठहरता नहीं है | बुला पास मुझे करना गैरो कहकसा उसकी आदत है | बदल गया मै उसकी खातिर मगर वो सुधरता नहीं है | उसके इश्क का असर इंतजार जाग रात भर करता हूँ | हर गली उसका जाना पास मगर वो फटकता नहीं है | जब भी आया वो पास मेरे हर घड़ी घड़ी देखता रहा | सुना दूँ अपने दिल की मगर मेरी वो सुनता नहीं है | करता करम ... »

‘बाबू जी की टूटी कुर्सी’

बाबू जी की टूटी कुर्सी चरमर-चरमर करती है जब बैठो उस कुर्सी पर डाल की तरह लचकती है बाबू जी उस कुर्सी पर बैठ के पेपर पढ़ते हैं और साथ में बाबू जी चाय की मीठी चुस्की लेते हैं सुबह सवेरे उठकर वो रोज टहलने जाते हैं लौट के आते जब बाबू जी मल-मल खूब नहाते हैं वह कुर्सी बाबू जी को बेटे माफिक प्यारी है टूट गई वह देखो फिर भी बाबू जी को प्यारी है… »

दर्जी

कविता- दर्जी ——————- फटी पैंट मेरी, ले दर्जी जी के घर जाता हूं, टूटी फूटी मशीन के संग, बैठा बुजुर्ग दर्जी हैं, देख मुझे मुस्कुराया वह, ढलती शाम तक में जो, 20 रुपए कमाया वह, कारण पूछा हंसने का, खुदा को दिल से धन्यवाद दिया, पहला ग्राहक दुकान पर आने का, बस एक हुनर था दर्जी में, बाकी अब उसमें सब कमियां थी, सुनो…… चश्मा उसका टूटा था, फटा कुर्ता उसका था, प... »

रात को भी धूप आती(कवित्त छंद)

ठंडक की आहट से उठ रही एक डर, कैसे कटेगा ये जाड़ा मिला न कम्बल गर। सिर पर छत नहीं, तन ढकने को नहीं, खुला आसमान है, जीवन है सड़क पर। सिकुड़-सिकुड़ कर रात काटी अब तक, फटी हुई चादर में सोया तन ढककर। अब तक मच्छर थे, चूसते थे तन मेरा, अब नहीं सोने देती शीत मुझे रात भर। सड़क किनारे सोता दीन सोचे मन में ये, रात को भी धूप आती ताप लेता घड़ी भर। — डॉ0 सतीश चंद्र पाण्डेय, चम्पावत। »

और मैं खामोंश थी…!!

आज बहुत उदास होकर उसने मुझे पुकारा, मैं पास गई और उसे प्यार से सहलाया… उसने मुझसे कहा तुम मुझसे नाराज हो क्या ? या जिन्दगी की उलझनों से हताश हो क्या ? मैंने मुस्कुराते हुए अपने आँसू छुपाकर कहा नहीं तो पगले ! तुझसे नाराज नहीं खुद से खफा हूँ मैं जिन्दगी से हताश नहीं हैरान हूँ मैं… बस कुछ दिनों से खुद से नहीं मिल पाई हूँ इसीलिए तुझे अपने प्रेम से सींच नहीं पाई हूँ… मेरी गोद में सिर ... »

बदल रही है ज़िंदगी

बदल रही है ज़िंदगी, बदल रही हूँ मैं..! तुम इश्क हो तुम्ही में ढल रही हूँ मैं!! नरमी तुम्हारे हाथों की ओढ़े हुए हैं धूप..! तपिश में इसकी बर्फ़ सी पिघल रही हूँ मैं!! जाना तुम्हें तो ख़ुद का कुछ होश न रहा! गिरती हूँ कभी और क़भी संभल रही हूँ मैं!! ख़ुद से छिपाती हूँ मैं अपने दिल का हाल! लगता है जैसे हाथों से निकल रही हूँ मैं..!! रस्ता भी मेरा तुम हो मंजिल भी तुम ही हो! जाऊँ जिधर भी तुम से ही मिल रही हूँ मैं... »

*खेतों की हरियाली*

देख के खेतों की हरियाली, नव-प्रभात ऊषा की लाली मन विभोर हो उठा है मेरा, मन मचले मत जा यहां से कितना सुन्दर गांव है मेरा पीली-पीली ओढ़ ओढ़नी, सरसों खड़ी मुस्काए मीठे गन्ने की पत्ती लहराकर, अपनी ओर बुलाए शुद्ध पवन है, ना कोई शोर कोयल कूके मेरे खेत में, नृत्य कर रहे हैं मोर तस्वीर बसा ली आंखों में, मैंने मेरे गांव की खेतों की हरियाली की और उस नीम की छांव की *****✍️गीता »

आज उन्हें जय हिंद लिख रही

डटे हुए हैं सीमा में वे, रोक रहे हैं दुश्मन को, चढ़ा रहे हैं लहू- श्रमजल, मिटा रहे हैं दुश्मन को। ठंडक हो बरसात लगी हो, चाहे गर्मी की ऋतु हो, सरहद के रक्षक फौलादी, रौंध रहे हैं दुश्मन को। भारत माता की रक्षा पर, तत्पर शीश चढ़ाने को, निडर खड़े हैं रक्षक बनकर, रौंध रहे हैं दुश्मन को। आज उन्हें जय हिंद लिख रही, अक्षरजननी यह कवि की, जो सीमा पर डटे हुए हैं, रोक रहे हैं दुश्मन को। मात्रिक छंद – उल्लाल... »

*आख़री खत*

वो मीठी बातें और मुलाकातें करते थे हम रात भर जो प्यार भरी बातें तुम जाने कितने तोहफे मुझे दिया करते थे, हर तोहफे में एक खत रखा करते थे.. उन खतों की बात निराली होती थी, पढ़ती थी अकेले जब हाथ में चाय की प्याली होती थी… तुम्हारे खतों की भाषा मेरी कविताओं से अच्छी होती थी, तुम्हारे हर खत को मैं बार-बार पढ़ती थी… फिर तुम्हारी एक गलतफहमी ने सब बर्बाद कर दिया, बहुत दूर तक जाने वाला था जो रिश्... »

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