संपादक की पसंद

कवि का समर्पण

आप लिखते खूब हो पर कभी गाते नही हो, मंच पर समर्पण भाव मे नजर आते नही हो। आपकी रचनाओं मे जीवन की सारी सच्चाई दिखती है, हर पाठक को उसमे अपनी ही परछायी दिखती है। आप कभी-कभी कड़वी बात भी लिख देते हो, लोगों को दर्पण मे उनका अक्स दिखा देते हो। कुछ लोग आपसे अन्दर ही अन्दर जलते है, पीठ पीछे आपकी खूब अलोचना करते है। पाठक से इतने सवाल सुनकर मुझे अच्छा लगा, फिर हर एक बात का मै भी जवाब देने लगा। मै जीवन की कड़व... »

शहीद को सलाम

शरहद पर से पापा मेरे फोन किए थे शाम को। कुछ दिन धीरज रखना बेटा आऊँगा मैं गाम को ।। पढ़ना लिखना खेल कूद में सदा रहो तुम आगे। दादा दादी और अम्मा का रखना ध्यान बड़भागे।। तेरे खातिर ढेर खिलौने लाऊँगा मैं ईनाम को।। कुछ दिन धीरज रखना बेटा आऊँगा मैं गाम को।। देख नहीं सकते दादाजी कान न सुनते दादी की। फिर भी सुनाते हमें कहानी शरहद के शहजादी की।। अम्मा मेरी पूजा करती सदा आपके नाम को। जल्दी आना पापा मेरे अपन... »

चाहता हूँ माँ

तेरे कांधे पे सर रख, रोना चाहता हूं मां। तेरी गोद में सर रख, सोना चाहता हूं मां। तू लोरी गाकर, थपकी देकर सुला दे मुझे, मैं सुखद सपनों में, खोना चाहता हूं मां। तेरी गोद में सर रख, सोना चाहता हूं मां।। इतना बड़ा, इतनी दूर न जाने कब हो गया, तेरा आंचल पकड़कर, चलना चाहता हूं मां। तेरी गोद में सर रख, सोना चाहता हूं मां।। जीने के लिए, खाना तो पड़ता ही है, तेरे हाथों से भरपेट, खाना चाहता हूं मां। तेरी गोद... »

हिन्दी सावन शिव भजन 2 -भोला जी की भंगिया |

हिन्दी सावन शिव भजन 2 -भोला जी की भंगिया | भोला जी की भंगिया ,गौरा जी की परेशानिया | मन मन रोती है गुस्सा करती है | भंगिया पिसती है गणेश जी की अम्मा | भोला जी की भंगिया ,गौरा जी की परेशानिया | भंगिया मै पीऊँगा जल्दी डालो कमंडल मे | भंगिया ना पिलाऊँगी देखे देव भूमंडल मे | चलो देवघर बाबा धाम मे | भोला जी की भंगिया ,गौरा जी की परेशानिया | बच्चे अभी छोटे है गणेश कार्तिक अच्छे है | बच्चो ना बिगाड़ो मन क... »

वंदेमातरम

मां तुझ से है मेरी यही इल्तज़ा। तेरी खिदमत में निकले मेरी जां। तेरे कदमों में दुश्मनों का सर होगा, गुस्ताख़ी की उनको देंगे ऐसी सजा। गर उठा कर देखेगा नजर इधर, रूह तक कांपेगी देख उनकी कज़ा। कभी बाज नहीं आते ये बेगैरत, हर बार शिकस्त का चखकर मज़ा। दुश्मन थर – थर कांपेगा डर से, वंदे मातरम गूंजे जब सारी फिज़ा। देवेश साखरे ‘देव’ »

देश के वीर जवानों के लिए

🍀🌷🌹🙏नमन् है मेरे देश के वीर सिपाही को 🍀🌹🙏 ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,, कोटी कोटी प्रणाम है मेरे देश के वीर सिपाहियों को जो अपनी जान की परवाह किए बिना मेरे देश की जान बचाने के लिए कोई कसर नही छोडंते बारम्बार प्रणाम आपको,,,, 🍀🌸🌷🌹 वीर तुम बढ़े चलो,,,, धीर तुम बढ़े चलो,,,,,🍀🙏 जान है जहान है आपने ये ना देखा कभी ,,, दुश्मनों की नजरे... »

फौजी

लिपट कर तुझसे तिरंगा भी रोया था उस पर मरने वाला आज उसमें ही घुसकर सोया था भारत माँ के सपूत ने चैन शान्ति बाँटी थी भारत माँ के लिए एक माँ ने अपना लाल खोया था लिपट कर तुझसे तिरंगा भी रोया था घर में नन्हीं चहकती सी चिड़िया वो छोड़ आया था अपने बटुवे में सारा घर घुसा लाया था बीवी का काजल, पिता का आशीर्वाद संग उसके आया था हमारे अमन के लिए वो अपनी हर रात नहीं सोया था लिपट कर तुझसे तिरंगा भी रोया था ताबूत... »

‘जंग का ऐलान’

जंग का ऐलान हम नहीं करते, पर जंग छिड़ जाने पर पीछे नहीं हटते। यही तो है हम हिन्दुस्तानियों का हुनर, सिर कटा सकते हैं पर झुका नहीं सकते। आखरी साँस तक लड़ते हैं हम फौजी देश के लिए, शहीद हो जाते हैं पर हिम्मत हार नहीं सकते। हारना तो हमको आता ही नहीं है और, कभी दहशतगर्द हम पर विजय पा नहीं सकते। मिट जाते हैं हँसते हुए हम अपने देश के लिए, पर कभी दुश्मन को पीठ दिखा नहीं सकते। हम दुश्मन को खदेड़ आते हैं उसकी... »

चाय में डूबे बिस्किट

चाय में डूबे बिस्किट सी हो गयी है जिंदगी कब टूट जाये, कब घुल जाये खबर नहीं »

जो बीत गई…

जो बीत गई वो याद बनी, यादों में एक चेहरा मुस्काया है आंखें हैं नम, दिल में है .गम, होठों ने गीत नया एक गाया है जो बीत गई वो याद बनी, यादों में चेहरा एक समाया है कहीं पर भी हों वो, दिल से दूर नहीं हैं कुछ यादों ने, कुछ ख्वाबों ने अक्सर हमको मिलवाया है जो बीत गई वो याद बनी… यादों ने गीत नया लिखवाया है »

हम परिंदे हैं…

हम बसाएंगे अपना घरौंदा कहीं… हम परिंदे हैं एक जगह रुकते नहीं… जहाँ मिलती हैं खुशियाँ जाते हैं वहाँ हम गमों में घरौंदा बनाते नहीं… चुनते हैं तिनके घोसले के लिए.. जिंदगी भर कहीं हम बसते नहीं… पंख हैं, हौसला है रुकेंगे नहीं.. भरेंगे जाकर उड़ानें कहीं… हम परिंदे हैं एक जगह रुकते नहीं… »

कहां रह गए वो??

इंतजार किया जी भर कर उनसे मिलने की कोशिश भी की, कहाँ रह गये वो जिन्होने हर वादा निभाने की कसम भी ली। आसान भी तो नही है सूर्य की किरणों की तरह बिखर जाना, खुद की खुशियों को न्यौछावर कर दूसरो को खुशी दे जाना। माना बहुत व्यस्त है जिन्दगी की उलझनों मे वह आजकल, पर कहाँ रह गये जो मुझे याद करते थे हर दिन हर पल। शायद खुशी मिलती होगी तुम्हे मुझे यूं तड़पता हुआ देखकर, मेरा क्या?तुम खुश रह लो मुझे दुनिया मे तन... »

अब उठ नौजवान

अब उठ नौजवान तुझे कुछ करना है जगमगाते दीप से सूरज की तरह चमकना है दिल जो कहे वो करना है ज़िंदा मछली की तरह धारा के विपरीत तैरना है ज़िन्दगी गिराएगी कभी भटकाएगी कहदे अपने होसलो से हर हाल में मंज़िल तक पहुंचना है अब उठ नौजवान तुझे कुछ करना है हार भी जाये तो गम मत करना अपनी राह पर चलते रहना क्यूंकि हार की रात कितनी घनी हो पर जीत का सवेरा तो होना है ना डर तू ना घबरा तू अपने होसलो के पंखो को फैलाके परिंदे... »

पत्थर होना आसान नहीं

मैं ‘पत्थर’ हो गया हूँ पर वो पत्थर नहीं जिसे ‘पूजा’ जाय, बस एक ‘साधारण पत्थर’, पर साधारण पत्थर होना ही क्या ‘आसान’ है? देखने में आसान लग सकता है, पर वो पत्थर कभी ‘मैग्मा’ रहा होगा धरती के अंदर, न जाने कितने ‘ताप’, कितना ‘प्रेशर’ उसने कितने दिनों तक झेला होगा, और जब ‘बर्दाश्त’ से बाहर हो गया होगा सबकुछ त... »

नारी शक्ति

मैं पुत्र उस नारी की जिनकी आंखों में पीड़ा देखी , उजागर करता हूं उन पीड़ा का……….। जनमानस से भरा जिसने धरती को , घर के कोनों में मजबूर हुई जीने को। दुर्गा, काली के रूप में पूजा जिनको  , शर्मसार किया उनको । सृष्टि की उत्पत्ति का प्रारंभिक बीज है वो , फिर भी गोद में कुचला उनको। नए – नए रिश्ते को बनाने वाली रीत है वो, हमने हर रिश्तो में नीचा दिखाया उनको। उसने हममें कोई फर्क नही... »

रोटी के तमाशे

ये उम्र, ये मजबूरियाँ और रोटी के तमाशे, फिर लेकर निकला हूँ पानी के बताशे। बाज़ार के एक कोने मे दुकान सजा ली, बिकेंगे खूब बताशे ये मैने आस लगा ली। सबको अच्छे लगते है ये खट्टे और चटपटे बताशे, इन्ही पर टिका है मेरा जीवन और उसकी आशायें। बेचकर इन्हे दो जून की रोटी का जुगाड हो जाता है, इसी कदर जिन्दगी का एक-एक दिन पार हो जाता है। अपने लड़खड़ाते कदमों पर चलकर स्वाद बेचता हूँ, इस तरह भूख और जिन्दगी का रोज खे... »

हमसे दीवाने कहाँ..

अब कहां हमसे दीवाने रह गये प्रेम की परिभाषा और मायने बदल गये,  तब न होती थी एक- दूजे से मुलाकाते,  सिर्फ इशारों मे होती थी दिल की बातें,  बड़े सलीके से भेजते थे संदेश अपने प्यार का।  पर अब कहाँ वो ड़ाकिये कबूतर रह गये,  पर अब कहाँ हमसे दीवाने रह गये।   जब वो सज- धजकर आती थी मुड़ेर पर,  हम भी पहुँचते थे सामने की रोड़ पर,  देखकर मुझे उनका हल्का- सा शर्माना,  बना देता था हमे और भी उनका दीवाना।  पर अब कह... »

मुठ्ठी भर यादें…

आज कुछ पुरानी सौगात मिली मैंने अपने कमरे की तलाशी ली। तो कुछ किताबें धूल में लिपटी हुई, कुछ खत, कुछ गुलाब के फूल सूखे हुए कुछ तस्वीरें, कुछ तोहफे और कुछ बन्द लिफाफे मिले। जिन्हें छुपाकर रखा था मैंने भूल गई थी दुनियादारी में पड़कर आज वो मुठ्ठी भर यादें मुझे मिल गई। जिन्हें मैने सबसे छुपाकर अपनी अलमारी में रख दिया था। आज वो यादें धूल में लिपटी हुई मुझे आ मिलीं। और उनकी स्मृतियों ने मुझे फिर विचलित कर... »

उम्र पार की

इन सुर्ख अधरों को मेरे गालों तक मत लाना चाहत और बढ़ जाएगी प्यार की अपनी जुल्फों को अब और मत लहराना रात लंबी हो जाएगी इंतजार की तड़पते रहेंगे उम्र भर मगर जुबां से कुछ ना कहेंगे उनको भी तो खबर होगी दिल ए बेकरार की तुम्हारी यादों को शब्दों में किस तरह ढालूं सुबह की धूप हो या कली अनार की कभी सावन कभी भादो जैसी लगती हो तुम सच क्या है देखूं एक बार उम्र प्यार की। वीरेंद्र »

“माँ मुझे विवाह नहीं करना”

समाज में स्त्रियों की दशा देखकर मेरे मन में उठे विचार:- माँ मुझे विवाह नहीं करना। पति की परछाई बनकर, पति के पीछे-पीछे नहीं चलना। माँ मुझे विवाह नहीं करना। अपने कलेजे के टुकड़े(संतान) पर, पति का आधिपत्य स्थापित नहीं करना। माँ मुझे विवाह नहीं करना। परिजनों की दी पहचान मिटा, ससुराल की प्रथा नहीं बनना। माँ मुझे विवाह नहीं करना। अपनी लीक से हटकर, पति की डगर नहीं चुनना। माँ मुझे विवाह नहीं करना। अपने सपन... »

ख्वाहिशों के समंदर…

तेरे-मेरे बीच में वो पहले जैसी बात नहीं रही। ना रही वो बातें, वो मुलाकात नहीं रही। ख्वाहिशों के समंदर पड़ गए सूखे-सूखे रीत में प्रीत में वो पहले जैसी बात नहीं रही। मुश्किलें अब सजा नहीं लगतीं ख्वाहिशों में भी वो पहले जैसी बात नहीं रही। गजब का फ़ितूर था हम दोनों के दर्मियां आफतों में अब पहले जैसी बात नहीं रही। आशियाना भी रास नहीं आता लोगों में वो पहले जैसी बात नहीं रही। »

यादों का सृजन

मेरी यादों के लम्हे चुन-चुन कर सृजन मत करो जिंदा लाश हूं मैं मेरे अर्थहीन शरीर से लगन मत करो बेनूर हो जाएंगी यह निगाहें जो अभी चमकती है भूल जाओ मुझे खुद को इस कदर मगन मत करो तुम्हारा रूप तुम्हारा रंग खुदा की अमानत है इसे मेरे लिए दफन मत करो उम्र भर तड़पोगे मेरी यादों का सृजन करके ऐसा जुल्म खुद से मेरे सजन मत करो। वीरेंद्र »

पिताजी

अपने सुख दुःख की पोटली को रख किनारे में हमारे सुख दुःख को अपना जीवन बनाया पिताजी ने ही हमे सब कुछ सिखाया कल तक चलना नहीं आता था चलना आपने सिखाया आज ज़िन्दगी की दौड़ में दौड़ रहा हूँ संभलना आपने सिखाया पिताजी ने हमे सब कुछ सिखाया कभी प्यार से कभी डांट के हमे सही गलत का मतलब बताया खाकर ठोकर रह ना जाये हमारा दिल कमजोर इस दिल मजबूत बनाया पिताजी ने हमे सब कुछ सिखाया »

हृदय की वेदना

हृदय की वेदना जब सीमा के पार हुई कोशिशें बहुत कीं कम करने की, पर वो शमशीर की धार हुई तब लेखनी चल पड़ी मेरी, दर्द कम करने के लिए दिल के जज्बातों को जब -जब किया बयां, एक कविता हर बार हुई »

दिवस विशेष

क्या माँ ने कभी विशेष दिन ही ममता लुटाया है। क्या माँ ने मात्र किसी खास दिन ही खिलाया है। क्या पिता ने कोई दिन देखकर जरूरतें पूरी की, या फिर केवल एक दिन सही गलत सिखाया है। इन्हें किसी एक दिन पूजना हमारी संस्कृति नहीं, फिर मात्र एक दिन ही विशेष किसने बनाया है। कैसी विडंबना है, हम कहने को तो आजाद हैं, परंतु पाश्चात्य सभ्यता ने हमें गुलाम बनाया है। देवेश साखरे ‘देव’ »

कैसे कहूँ?

कैसे कहूँ, किससे कहूं कि हाल ए दिल क्या है, रोना अकेले ही है अंजाम ए बयान क्या है। जब तक खुश रहती हूँ, लोगों की हंसी सुनाई देती है। जब दुखी होती हूँ बस अपनी चीख सुनाई देती है। बाते बहुत है पर डर लगता है कुछ कहने से, बहुत से किस्से हैं दिल के कोने में सहमे से। डर लगता है लोग क्या कहेंगे, क्या सोचेंगे मेरी बाते सुनकर। इसीलिए मैंने भी खुद को छुपा लिया कुछ किरदार चुनकर। खुदको खोने का डर भी सताता है, आ... »

“मेरी कलम की धार”✍

उठाई थी कलम कुछ अनसुलझे सवाल लिखने के लिए। अपने दिल के ज़ज्बात ना जाने कब लिखने लगी। लोग कहते हैं कि मैं बहुत अच्छा लिखने लगी। बस जितनी तकलीफें मिलती रहीं तुझसे, “मेरी कलम की धार” उतनी तेज चलने लगी। रूबरू होते गए हम तेरे दर्द से जितना मेरी आँखों से मोतियों की लड़ी झड़ने लगी। किस्से तो रोज सुनती थी इश्क, मोहब्बत के। पर ना जाने कब! मैं भी तुझसे प्यार करने लगी। रोका बहुत था मैंने अपने दिल को... »

वह पहले जैसी बात नहीं

क्यूँ आज सूरज हो गया निस्तेज वह पहले जैसी बात नहीं। हवा भी चल रही है मद्धम-मद्धम उसमें भी पहले जैसी बात नहीं। न जाने क्यों बेरुखी कर रहे हैं सब मौसम के साथ कोई भी तो नहीं दिखाई देता। हर गली कह रही है वह पहले जैसी बात नहीं। पहले तो यूं भीड़ उमड़ी रहती थी। हर गली नुक्कड़ पर लोगों की जमात लगी रहती थी। ऊपर वाले के एक फैसला से इतना आ गया फासला! रिश्तों में भी अब पहले जैसी बात नहीं। कितनी मायूसी छाई है च... »

विपक्ष की राजनीति

विपक्ष की गंदी राजनीति, हक से बेशक करो। सैन्य बल कि शौर्यता पर, नाहक ना शक करो। जो तुम निशस्त्र वीरों को ज्ञान बाँट रहे। तुम्हारे पूर्वजों का बोया ही वह काट रहे। हाथ अब बंधे नहीं, आदेश की प्रतीक्षा नहीं, विजय तिलक से सजता अब ललाट रहे। वीरों की वीरता पर प्रश्न खड़े करने वालों को, उत्तर मिल जाए, विध्वंस इतना विनाशक करो। सैन्य बल कि शौर्यता पर, नाहक ना शक करो। विपक्ष की गंदी राजनीति, हक से बेशक करो। ... »

नमन 🙏

जिनके नाम से दुश्मन थर थर कांपा करते है बलिदान हुए वीर जवानो को हम सब नमन करते है ये सच्चे देश भक्त है ऐसे नहीं जायेंगे दुश्मनो को अपनी रूह से भी हराएंगे देश को जगमगाये ये वो अमरदीप है देश के लिए मर मिटे ये वो शहीद है वो चले गए अब हमे उनकी राह पर चलना है उनकी तरह अपने देश के लिए कुछ करना है हमारी सुरक्षा के लिए सीमा पर तैनात ये रहते है सभी वीर जवानो को हम सब नमन करते है जय हिन्द 🙏 »

बेटियाँ ही नहीं, बेटे भी घर छोड़ते हैं।

ये भाग- दौड़ के किस्से अजीब होते हैं, सबके अपने उद्देश्य और औचित्य होते हैं। कभी शिक्षा कभी जीवन की नव आशा में, सिर्फ बेटियाँ ही नहीं, बेटे भी घर छोड़ते हैं। जीवन में सबके अजीब उधड़बुन होती है, समस्याओं की फ़ौज सामने खड़ी होती है। गुजरना पड़ता है जब विपरीत परिस्थितियों से, सिर्फ बेटियाँ ही नहीं, बेटे भी प्रताड़ित होते हैं। जब सफलता और रोजगार की बात होती है, असफलता पर जब कुण्ठा व्याप्त होती है। सारे प्रया... »

कब कोई सिपाही जंग चाहता है

कब कोई सिपाही ज़ंग चाहता है। वो भी परिवार का संग चाहता है। पर बात हो वतन के हिफाजत की, न्यौछावर, अंग-प्रत्यंग चाहता है। पहल हमने कभी की नहीं लेकिन, समझाना, उन्हीं के ढंग चाहता है। बेगैरत कभी अमन चाहते ही नहीं, वतन भी उनका रक्त रंग चाहता है। खौफ हो उन्हें, अपने कुकृत्य पर, नृत्य तांडव थाप मृदंग चाहता है। ख़ून के बदले ख़ून, यही है पुकार, कलम उनका अंग-भंग चाहता है। देवेश साखरे ‘देव’ »

हर गली रुदन करती है

कितना कष्ट होता है जब एक सैनिक शहीद होता है । पूरा देश रोता है । हर गली रुदन करती है । एक अशांत-सी पीड़ा मन में घर करती है । रोती है धरती जब मृत सैनिक को गोद में लेती है । अग्नि भी गर्मी कम करके शोक प्रकट करती है । जिस जगह से गुजरता है जनाजा वह गली रुदन करती है। माँ की छाती में दूध उतरता है जब बेटे की अर्थी आती है। पत्नी छाती पीट पीटकर बेसुध होती जाती है । मेरी कलम रोती है जब किसी सैनिक के शहीद होन... »

बहुत याद आते हैं

बहुत याद आते हैं, वो गुजरे हुए पल। वो तुम्हारे खत का इंतजार। हर पल मिलने को बेकरार। गलियों में घुमना बनकर आवारा, पाने को एक झलक का दीदार। बहुत याद आते हैं। तुम्हारे मिलने का वादा। बेकरारी बढ़ाती और ज्यादा। मिलने के बाद तुमसे, ना जाने देने का इरादा। बहुत याद आते हैं । बेपरवाह थे, क्या कहेगा जमाना। फिर भी छुप कर मिलना मिलाना। छिपकर मिलने का अलग मजा था, हर जुबां पे था बस हमारा फसाना। बहुत याद आते हैं... »

नश्तर

कहीं दिल पे नश्तर , तो कहीं नश्तर पे दिल। ज़माना खराब है ग़ालिब जरा संभल के मिल।। »

दुनिया भयी बाबरी

कोरोना बीमारी के लगातार बढने के बावजूद किसी भी तरह की कोई सावधानी लेने से लोग परहेज कर रहे हैंं यह ऐसा समय है जब सबको अपने और अपने परिवार का ख्याल रखना चाहिये और हर संभव सावधानी रखनी चाहिये लेकिन लोग सोशल डिस्टेंसिंग की धज्जियां उड़ाते हुये, बेपरवाह, बिना किसी काज के घूमते आपको हर जगह मिल जायेंगे, इसी स्थिति पर दो लाइन प्रस्तुत हैं – दुनिया भयी बाबरी, छोड़ समझ को संग बैठ के देखत रहो, अब तरह तर... »

बहती नदिया सी बह गई मैं

लोभी दुनियां में जी गई मैं, विष का प्याला पी गई मैं ना मीरा हूं ना नीलकंठ, फिर भी सब झेल गई मानों प्राणों पर खेल गई, हुई भावहीन,हुई उदासीन कंचन सी निखर गई, टूटे मोती सी बिखर गई अंतर्मुखी सब कहने लगे, सबका कहना सह गई मैं, बहती नदिया सी बह गई मैं »

गिरेबां

गिरेबां अपनी जब भी झांकता मैं। हर बार पाता, कहाँ तू और कहाँ मैं। आईना मैं भी देखता हूँ, वाकिफ़ हूँ, और भी बेहतर हैं ‘देव’ तुझसे जहाँ में। देवेश साखरे ‘देव’ »

बाल गीत – मजदूरी ना कराना |

अंतरराष्ट्रीय बाल श्रम निषेध दिवस के अवसर पर बाल श्रमिकों के नाम प्रस्तुत मेरी एक बाल गीत बाल गीत – मजदूरी ना कराना | लगा लॉक डाउन बाल मजदूरी ना कराना | भूखे बच्चो भोजन कराना जी हुज़ूरी ना कराना | अबोध बच्चो को प्यार का सहारा है | माँ बाप के प्यार ने जीवन उनका सुधारा है| नन्हें हाथो हथोड़ा ना कोई थमाना | भूखे बच्चो भोजन कराना जी हुज़ूरी ना कराना | जीना खाना पढ़ना रहना अधिकार है | खेलना कूदना हँसना उपच... »

कविता (स्वतंत्रता दिवस प्रतियोगिता)

झांक हमारे अंदर लहू है, पानी नहीं। आज़मा कर देख, हम किसी से कम नहीं क्यों इतराता है, तू अपनी ताक़त पे। गर आज हम नहीं, तो कल तू भी नहीं।। अपना हक़, सिन्हा चीर कर ले लेंगे हम। झुका दे मुझे , तुझ में इतना दम नहीं।। गर गिर गये हम तो, संभलना जानते हैं। हम से है जमाना , जमाने से हम नहीं।। यही मिट्टी मांगा था , कभी लाल लहू। लहू से सिंचे है भारत को, पानी से नहीं।। मेरे वतन पे, बुरी नज़र रखने वाले। धूल न च... »

द्रौपदी का प्रण

बाहुबल से सबल रहे, फिर क्यों विफल रहे। केश पकड़ घसीटा गया, भरी सभा मुझे लुटा गया। दुःशासन का दुस्साहस तुम देखते रहे, दुर्योधन का अट्टहास कर्ण भेदते रहे। वरिष्ठ सभासद मूक दर्शक बने रहे, कौरवों के भृकुटी क्यों तने रहे। वो चीर मेरा हरते रहे, अस्मिता तार करते रहे। केशव ने रक्षा-सूत्र का धर्म निभाया, भरी सभा मुझे चीरहरण से बचाया। क्यों पतिधर्म का खयाल न आया, क्यों तुम्हारे रक्त में उबाल न आया। अंहकार क... »

ऐ ज़िन्दगी

ऐ ज़िन्दगी मैंने तुझको दिया क्या है तेरे लिए किया क्या है तूने मेरे गम पे खुशियों के वस्त्र ढक दिए तेरे लिए मैंने सिया किया है ना रखा तुझे खुश ना रखा ऐशो आराम में हर पल तुझसे माँगा तुझे दिया क्या है मैं पराया मांगू हर चीज़ स्वार्थ में तू अपना समझ कर दे निस्वार्थ में आखिर समझ नहीं आया ये रिश्ता क्या है तूने हर वक्त साथ दिया मेने हर कीमती वक्त है खोया तू तो हर वक्त मेरे लिए ही जिया है पर ऐ ज़िन्दगी मैं... »

धधक रहा है मुल्क

धधक रहा है मुल्क, और कुछ आग मेरे सीने में। वफ़ादारी खून में नहीं तो फिर क्या रखा जीने में। वतन परस्ति से बढ़कर, और कोई इबादत नहीं, वतन परस्ति का सुकून, न काशी में न मदीने में। सियासत के ठेकेदार, देश जला सेंक रहे हैं रोटी, हमारे घरों में रोटी, मिलती मेहनत के पसीने में। अच्छे ताल्लुकात हैं उनसे जिन्हें मैं जानता हूँ, वो पत्थर नहीं फेंकते, चढ़ ऊँची इमारत के ज़ीने में। बिखरना लाज़मी है, जब मजहबी दरार ... »

कविता- इंसान मे जानवर

कविता- इंसान मे जानवर हाथी एक जानवर मगर इंसान की इंसानियत ढोता रहा | थके मांदे एक शेर के बच्चे को अपनी सुंढ मे ढोता रहा | इंसान कहने को आदमी मगर जानवर से बदतर होता जा रहा | गर्भवती हथिनी को बम भरा फल खिलाये जा रहा | दर्द की हद को हराने जल के अंदर साँसे रोक मुंह को जल मे सुबाए पानी और पानी पिता रहा | खड़े खड़े अपनी जिंदगी की साँसे रोके जा रहा | पशु हिंसक हो सकता था कितनों को रौंद सकता था मगर दर्द सार... »

भारती की अथहा पीड़ा

क्षणभर में क्षीण हो छलकी आंख भारत मां की जब मजदूरों के छाले सीने में लेकर बैठ गई निज संतान का दर्द दिखा तो ऐसी दर्द की आह,,,,, भरे जैसे लोह पथ गामिनी सीने के छाले रौंद गई कटी छिली हाथों की लकीरें एक संघर्ष सुनाती हैं सूरज के ताप से जलती गोद मेरी उनके कदम जलाती है निराशा से ग्रस्त नयन आस को निहारते कहीं दिख जाए कोई जल भोज बाटते महामारी ने मुंह बांधा तो मार भूख की बड़ी लगे पेट पे कपड़ा बांध लिया आंस... »

लाचार

वक्त ने कैसा करवट बदला बेज़ार होकर। तेरे शहर से निकले हैं बेहद लाचार होकर। पराया शहर, मदद के आसार न आते नज़र, भूखमरी करीब से देखी है बेरोजगार होकर। तय है भूख और गरीबी हमें जरूर मार देगी, भले ही ना मरे महामारी के शिकार होकर। आये थे गाँव से, आँखों में कुछ सपने संजोए, जिंदगी गुज़र रही अब रेल की रफ़्तार होकर। बेकार हम कल भी न थे, और ना आज हैं, दर-ब-दर भटक रहे, फिर भी बेकार होकर। जरूरत मेरी फिर कल तुझक... »

नारी

अबला थी जो नारी अब तक सबला बनके दिखलाएगी पुरुष के हाथों की कठपुतली अब दुनिया को चलाएगी । घुट घुट के यह मरती रही मुंह से कभी भी आह न की पुरुष ने अपनी राह बना ली पर नारी को राह न दी । अब खुद अपने दम पर वह परचम ऊंचा लहराएगी अबला थी जो नारी अब तक सबला बन के दिखलाएगी । त्याग और बलिदान में आगे भारत की हर नारी है चुप चुप रहकर हर जुल्म सहे रो रो कर रात गुजारी है । अब ना सहेंगे जुल्म पुरुष का संदेश यह जन-ज... »

मन की पतंग

मीठे मीठे सपने संजोने दो होता है जो उसे होने दो कल का पता नहीं क्या होगा बाहों में और थोड़ा सोने दो ।……….. जागी है अखियां हम सो गए हैं यादों में उनके हम खो गए हैं रोको ना रस्ता उनकी निगाहों का प्यार के बीज और बोने दो । मीठे मीठे सपने संजोने दो …………. कैसे बुझाए अब दिल की लगी को खिलने से कौन रोके मन की कली को प्यार की राहों में छिप जाए अगर ढूंढना न मुझको और ... »

जब तू याद आया

जब मैं हुई उदास, तो तेरा मुस्कुराना याद आया जब हुई तुझसे दूर, तो तेरा पास आना याद आया तू नहीं आया, पर तेरी याद चली आई तेरी याद से मिलकर, मुझे मुस्कुराना याद आया किताब में रख़ा मिला एक सूख़ा फ़ूल गुलाब का आज फ़िर से वो किस्सा सुहाना याद आया आंखों में नमी है, मग़र रोती नहीं हूं मैं किसी को दिया हुआ, एक वादा पुराना याद आया फुर्सत से बीत जाते हैं, जब कुछ पल मेरे मुझे फ़िर वो गुज़रा ज़माना याद आया »

मजदूर

हमारा कसूर क्या था आखिर क्यों मजदुर हुए हम दर दर भटकने पर मजबूर हुए हम इस महामारी से तकरार है रोजी रोटी की दरकार है अपनों से मिलने के लिए बेक़रार हुए हम मरने का खौफ नहीं अपनों के साथ जीने मरने की खायी है कसम इस कसम को निभाने के लिए नाराज रास्तो पे चल पड़े हम जिन्दा रहे तो कीड़ों-मकोड़ों से रेंगते नजर आयेंगे । मर गए तो ये सवाल, तुझसे पूछे जायेंगे । मेरा कसूर बता, क्यों मजदूर हुए हम । »

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