Tag: संपादक की पसंद

संपादक की पसंद

  • रोड़ी-रेत-सीमेंट का अनुपात

    वो मिस्त्री के साथ
    काम करने वाला मजदूर,
    कहना मानने को है मजबूर,
    ईंट लपका दे,
    मसाला फेंट दे,
    थोड़ा गीला बना,
    थोड़ा सख्त बना,
    चल टेक लेकर आ,
    सरिया मोड़,
    टूटी हुई बल्ली को जोड़,
    इधर आ उधर छोड़
    ये टेड़ा है इसे तोड़।
    ईंट की हर मजबूती
    जानता है वह
    सीमेंट के सैट होने का
    वक्त समझता वह,
    कभी जुड़ता है
    कभी बिखरता है वह।
    रोड़ी-रेत-सीमेंट का अनुपात,
    जानता है वह,
    ठोस बनने से जुड़ी
    हर बात जानता है वह,
    लेकिन बन नहीं पता
    पेट की खातिर हर बात
    मानता है वह।
    सीमेंट से सने हाथ
    पसीने से भीगा तन
    कर्मठ सा व्यक्तित्व
    कोमल सा मन।
    लंच के समय
    पानी पी लेता है,
    सुबह के आधे पेट नाश्ते से
    दिनभर जी लेता है।
    मिस्त्री का अस्त्र है वह
    इमारत बनाने का शस्त्र है वह।
    मेहनत की पहचान है वह
    एक कर्मठ इंसान वह।

  • वक्त के रंग

    वक्त कब क्या रंग दिखाए हम नहीं जानते
    वक्त के दिए हुए जख्म कैसे मिटाएं हम नहीं जानते
    क्या पता था उस देवकी को,
    जिस डोली में बिठाकर ,विदा कर रहे थे कंस
    याकायाक उसे कारावास ना भेजतें
    वक्त कब क्या रंग दिखाए हम नहीं जानते
    क्या पता था उस राम को ,
    जिसे रात में राज्य मिलने वाला था ,
    उन्हे सुबह बनवास ना भेजतें
    वक्त कब क्या रंग दिखाए हम नहीं जानते
    क्यों रौब झाड़ते फिर रहे अपनी कमाई दौलत शोहरत पर
    कुछ अपनी ऐसी छवि बनाए ,
    ताकि लोग भी मजबूर हो जाए
    आंसू बहाने के लिए हमारी भी मय्यत पर
    सुना है मैंने , अच्छे लोगों को लोग नहीं भूलते

  • जरा दिल को थाम के

    कोरोना बीमारी की दूसरी लहर ने पूरे देश मे कहर बरपाने के साथ साथ भातीय तंत्र की विफलता को जग जाहिर कर दिया है। चाहे केंद्र सरकार हो या की राज्य सरकारें, सारी की सारी एक दूसरे के उपर दोषरोपण में व्यस्त है। जनता की जान से ज्यादा महत्वपूर्ण चुनाव प्रचार हो गया है। दवाई, टीका, बेड आदि की कमी पूरे देश मे खल रही है। प्रस्तुत है इन्ही कुव्यथाओं पर आक्षेप करती हुई कविता  “जरा दिल को थाम के”।

    चुनाव   में  है   करना  प्रचार  जरूरी  ,
    ऑक्सीजन की ना बातें ना बेड मंजूरी,
    दवा मिले ना मिलता टीका आराम से ,  
    बैठे हैं चुप चाप  जरा दिल को थाम के,
    आ जाए ना चुपचाप कोरोना धड़ाम से।

    खांसी किसी को आती तो ऐसा लगता है ,
    यम का है कोई दूत घर पे  आ गरजता है ,
    छींक का वो ही असर है  जो भूत नाम से ,  
    बैठे हैं चुप चाप  जरा दिल को थाम के,
    आ जाए ना चुपचाप कोरोना धड़ाम से।

    हाँ हाँ अभी तो उनसे कल बात हुई थी,
    इनसे भी तो परसो हीं मुलाकात हुई थी,
    सिस्टम की बलि चढ़ गए थे बड़े काम के,
    बैठे हैं चुप चाप  जरा दिल को थाम के,
    आ जाए ना चुपचाप कोरोना धड़ाम से।

    एम्बुलेंस की आवाज है दिन रात चल रही,
    शमशान  में  चिताओं  की बाढ़ जल  रही,
    सहमा हुआ सा मन है आज  राम नाम से,
    बैठे हैं चुप चाप  जरा दिल को थाम के,
    आ जाए ना चुपचाप कोरोना धड़ाम से।

    भगवान अल्लाह गॉड सारे चुप खड़े हैं ,
    बहुरुपिया  कोरोना  बड़े  रूप  धड़े  हैं ,
    साईं बाबा रह गए हैं बस हीं नाम  के   ,
    बैठे हैं चुप चाप  जरा दिल को थाम के,
    आ जाए ना चुपचाप कोरोना धड़ाम से।

    अजय अमिताभ सुमन:सर्वाधिकार सुरक्षित 

  • लोकतंत्र का पर्व है ( व्यंगात्मक छंद)

    कोरोना का कहर है
    हर गली हर शहर है
    फिर भी लोकतंत्र का पर्व है
    सोशल डिस्टेंसिग किधर है ?
    वोट पड़ रहे हैं धड़ाधड़
    वो कहाँ है जिन्हें कोरोना से लगता डर है
    कैसा बनाते हैं नेता बेवकूफ
    अपने स्वार्थ हेतु
    और हम बन जाते हैं
    लाइन में लगकर बेखौफ हम
    वोट देने जाते हैं
    नजर आता हमें अपना फायदा
    पर होता किधर है ??
    फिर भी…

    कोरोना का कहर है
    हर गली हर शहर है….

  • कटघरे में हर शख्स

    कटघरे में खड़ा
    है हर शख्स
    आज…

    कुदरत पूछ रही
    है कई सवाल
    आज…

    काबिल है क्या
    कोई हम में से
    जवाब जो
    दे सके
    आज…

    काटी वही
    शाख हमने
    जिस पर आराम
    फरमाया था तलक
    आज…

    फिर भी किसी
    चमत्कार की
    आस लगाऐ
    बैठा है मानव
    आज….

    करिश्मा कोई
    होगा नहीं
    मानव को ही
    करना होगा प्रयास
    आज….

    मानवता का फर्ज
    निभाने,प्रकृति
    का कर्ज
    उतारने का
    वक्त आया है
    आज….

  • जीवन श्लेष युक्त कविता है

    जीवन श्लेष युक्त कविता है
    इसको सुलझाते-सुलझाते
    सारी उम्र बीत जाती है
    लेकिन सुलझ नहीं पाती है।
    अर्थ, रहस्य, लक्ष्य क्या इसका
    है किस हेतु बना यह
    या केवल है स्वप्न देखने
    मिटने हेतु बना यह।
    हँसना-गाना खुशी मनाना
    कभी है रोना-धोना,
    कभी काटना फसल स्वयं की
    कभी है फिर से बोना।
    चक्र चला दिन हुआ कभी तो
    कभी रात फिर होना,
    कभी पाप के मैल में रमना
    कभी नदी में धोना।
    आज नहीं तो कल सुख होगा
    इसी आस में रहना,
    सुख आने तक चला-चली में
    बिन जाने चल देना
    कल भोगूँगा सोच सोच कर
    धन संचय कर लेना
    लेकिन उसको भोग न पाना
    बिन भोगे चल देना।
    जीवन श्लेष युक्त कविता है
    इसको सुलझाते-सुलझाते
    सारी उम्र बीत जाती है
    लेकिन सुलझ नहीं पाती है।
    ——- डॉ0 सतीश चंद्र पाण्डेय, चम्पावत, उत्तराखंड।

  • नाटक के किरदार अनेकों

    नाटक के किरदार
    अनेकों रूप-रंग के हैं
    अलग अलग मुखौटे पहने
    अलग ढंग के हैं।
    जीवन में मिल जाते हैं
    हम भी घुल मिल जाते हैं,
    कभी पहचान कर लेते हैं
    कभी धोखा खा जाते हैं।
    कभी गिराने का
    कभी मिटाने का
    कभी हिलाने का भीतर तक
    मौका पा जाते हैं।
    आखों में लाकर नमी सी,
    मन में आस जगाते हैं,
    बाहर से ठंडाई सी ला
    भीतर आगे लगाते हैं।
    संपदा और धन के मद में
    बौरा कर चलते हैं,
    निर्धन की निर्जीव समझते
    मद में ही रहते हैं।
    खुद को मानवता का सेवक
    कहते नहीं थकते हैं,
    लेकिन मानवता को
    पीड़ा देते रहते हैं।

  • बड़ा जखम दिया है,इस ज़माने ने

    बड़ा जखम दिया है,इस ज़माने ने
    सदियों लगेगी मूशकुराने में,

    अजब सी दरियादीली देखी ज़माने की,
    गरीबों को रुलाने में,अमीरों को हँसाने में.

    कहीं पर खुले अत्तयाचार है,तो कहीं पे
    मीठी जुबान पे तलवार है,

    जरा सी बात पर सारे रीशते तोड़ देते हैं,सारी
    रीवायते छोड़ देते हैं,

    जहान सदियों गुजर जाती हैं,”महमूद” रिश्ते बनाने में,रुठो को मानाने में.

    बड़ा जखम दिया है,इस ज़माने ने
    सदियों लगेगी मूशकुराने में.!

    By- M.A.K

  • अंतर्राष्ट्रीय नृत्य दिवस (भाग -२)

    आओ अपने भारत का भ्रमण कर ले,
    बिसरी हुई नृत्यकला फिर से चित्रण कर ले,
    दक्षिण भारत की नृत्य शैली है भरतनाट्यम,
    अपने केरल की नृत्य शैली है मोहिनीअट्टम,
    अपने उत्तर भारत का प्रमुख कत्थक नृत्य,
    जो कभी श्री कृष्ण ने किया नटवरी नृत्य,
    उड़ीसा में जगन्नाथ जी को समर्पित नृत्य ओड़िसी,
    अपने आंध्र प्रदेश का प्रसिद्ध नृत्य कुचिपुड़ी,
    मणिपुर और असम जाकर देखा नृत्य बिहू और मणिपुरी,
    पहुंची गुजरात तो देखा गरबा और डांडिया,
    उत्तराखंड का मन भाया नृत्य थडिया और छोलिया,
    पहुंची राजस्थान जो देखा घूमर, झांझी,कठपुतली,
    रऊ नृत्य जम्मू का देखा,गढ़वाल का नृत्य है गढ़वाली,
    पहुंची महाराष्ट्र तो देखा, टिपरी कोली गोक नृत्य गौरीचा,
    जाना हुआ पंजाब रोक न पाई खुद को,हमने भी कर लिया गिद्दा और भांगड़ा,
    उत्तर प्रदेश का मनभावन है अंबर नीला,देखा सुंदर सा चट्टा नृत्य,थाली नृत्य,और रासलीला,
    झारखंड में देखा छऊ नृत्य और देखा नृत्य फगुआ,
    आज है नृत्य दिवस यह याद रखो बबुआ।
    अपने कर्नाटक की संपन्न नृत्य शैली तो यक्षगान है,
    अपने देश की सुंदर नृत्य शैली अपने भारत का सम्मान है।
    सब मिल अंतर्राष्ट्रीय नृत्य दिवस मनाए यह तो विश्व की शान है।
    एकता की कलम कर रही आज नृत्यों का बखान है।।
    —✍️—-एकता—

  • अंतर्राष्ट्रीय नृत्य दिवस (भाग१)

    नृत्य कला तो ईश्वर की कृपा से मिला हुआ वरदान है,
    पर नृत्य को “नाच” कहकर संबोधित करना यह नृत्य कला का अपमान है।
    नृत्य कला युगो-युगो से चली आई,
    क्या इसका तुमको भान है?
    चाहे कान्हा की हो नगरी ,या राम की हो अवध नगरी,
    होता कोई उत्सव तो,नृत्य कर आनंदित होती जनता सगरी,
    पूरे घट-वासी संग पशु-पक्षी भी झूमे,
    करते सुंदर स्तुति नृत्यगान है।
    क्यों हम भूल गए अपनी नृत्य कला,
    क्यों हम इससे अनजान हैं,
    आओ मनाले आज अंतर्राष्ट्रीय नृत्य दिवस,
    यह संपूर्ण विश्व की पहचान है।।
    –✍️–एकता—–

  • मनभावन मौसम

    बड़ा सुहाना मनभावन मौसम आया है,
    बादलों से गिरती बूंदों ने,
    धरती का संताप मिटाया है।
    बड़ा मनभावन मौसम आया है।।
    काले-काले बादल उमड़_ घुमड़ कर आए,
    मेढक भी देखो बिलों से निकल,
    टर्र_ टर्र का गीत सुनाए,
    कोयल ने मीठी वाणी में,
    मधुर संगीत सुनाया है।
    बड़ा मनभावन मौसम आया है।।
    वृक्षों के कोमल पत्तों पर,
    हरियाली फिर से भर आई,
    गर्मी की तपन ज्यों दूर हुई,
    तन मन में शीतलता त्यों आई,
    दामिनी तड़की फिर मेघों ने,
    ठंडी फुहार बरसाया है,
    मस्त पवन के झोंकों ने,
    रूह को सुकून पहुंचाया है।
    बड़ा सुहाना मनभावन मौसम आया है।।

  • लओट कर ना आया,ओ रहबर

    लओट कर ना आया,ओ रहबर – रहगुजर मेरा,
    त उमर रहा,तनहा सफर मेरा,

    हर रिश्ते फरेब देते रहे मुझे,ज़िन्दगी के हर मोड़ पर,
    बेवजह नेछावर कर दिए मैंने लहु का एक एक कतरा मेरा,

    ये फज़ा भी रूठी रूठी सी लगती है मुझसे,
    ये उसी तरफ बहती हैं,जहाँ जाता नहीं रास्ता मेरा.

    एक कसम के खातिर सारी उम्र गुजर दी,
    कभी कभी सोचता हूँ ” महमूद “,
    क्या शर्त के बुनियाद पे टीका था हर रिश्ता मेरा.

    By – M.A.K

  • अभ्यास कीजिये

    पानी है यदि सफलता
    अभ्यास कीजिये,
    अपने हुनर का तुम निरंतर
    अभ्यास कीजिये।
    व्यवहार में कमी हो कहीं
    अहसास कीजिये
    कमियां सुधारने का,
    अभ्यास कीजिये।
    आदत है बोलने की
    तो सच बोलिये,
    जिह्वा में सच समाये
    अभ्यास कीजिये।
    करनी है जिद तो आप
    कुछ बनने की कीजिये
    गिरने की जिद नहीं हो
    अभ्यास कीजिये।
    अपने में मुग्ध हो तो
    होते ही जाईये
    कमियां दिखें स्वयं की
    अभ्यास कीजिये।
    निंदा की बात करना
    व्यवहार में अगर हो
    तो छूट जाए वह सब
    अभ्यास कीजिये।

  • प्रतिकार करना है

    रोना नहीं है तुम्हें
    प्रतिकार करना है,
    बुरी नजर से देख पाये नहीं
    कभी कोई ,
    तुम्हें बन दुर्गा, महाकाली
    दुष्ट दल को मसल कर रखना है।
    तुम्हारी राह तब तक
    है नहीं महफूज जब तक
    खुद के भीतर
    जगा चंडी जगा काली
    नहीं मर्दन करोगी।
    तुम्हारी निरीह बोली
    नहीं कोई सुनेगा
    जब तलक नहीं तुम गर्जन करोगी।
    दया का, धरम का
    लोप सा हो गया है,
    निर्लज्जता की व्याप्ति है सब तरफ,
    संवेदना में जम गई है धूल की परत।
    वासना में विक्षिप्त कर रहे हैं
    नजरों से प्रहार,
    निकाल ले चंडी बन तलवार
    रोना नहीं है करना है गलत का प्रतिकार।

  • हद को लाँघिये

    कुछ नया इतिहास रचना है
    तो हद को लाँघिये
    अन्यथा रेखा के भीतर,
    इंच में कद नापिये।
    दूसरे की औऱ अपनी
    कीजिये तुलना नहीं,
    तुम गलत के सामने
    गलती से भी झुकना नहीं।
    लिंग से और जाति से
    खींची गई रेखा मिटाकर
    सब बढ़ें आगे सभी को
    खूब अवसर दीजिये।
    गर्व का पीकर हलाहल
    क्यों दसानन सा बनें
    दूसरों की तोड़ रेखा
    मान भी मत कीजिये।
    तोड़ कर सब रूढ़ियाँ जो
    रोकती हैं उन्नयन को,
    भेदभावों को मिटाकर,
    कुछ नया सा कीजिये।

  • समाज का विकृत रूप भाग(३)

    आज की शिक्षित समाज के लोगों को मैंने अनपढ़ पाया ,
    बेटी बनी बहू को भी एक पल में ठुकराया,
    मानवता तो बची नहीं जताते बड़ा अपना_ पराया ,
    मायका भी है ससुराल भी है गोद में एक मासूम सा बच्चा भी है , लोगों की भीड़ में उसने खुद को अकेला पाया ,
    ना जाने हम सब में ही छुपा कहां दानव बैठा ,
    जिसने स्त्री के अस्तित्व को मिटाने का नियम बनाया ,
    हे ईश्वर आपकी बनाई दुनिया ने स्त्री का क्यों मजाक बनाया ।।——✍️–एकता—-

  • समाज का विकृत रूप भाग(२)

    2 साल अभी बस बीते, पोते की खुशी में सब जीते ,
    अचानक पति की तबीयत बिगड़ी और वह सांस ना ले पाया,
    छोड़ दी उसने अपनी सांसे ऑक्सीजन उसे न मिल पाया ,
    बेटे की मौत हुई अभी दो दिन हुए नहीं बहू को भी ससुरालियों ने ठुकराया,
    जिस बेटी ने बन बहू, बीवी, सब का फर्ज निभाया ,
    पति की मौत जैसे हुई, क्यों सब ने उसका अस्तित्व मिटाया,
    ना मायके का साथ न ससुरालियों ने अपनाया ,
    मायके वाले भी सोचे हमने तो बेटी की शादी कर सारा फर्ज निभाया ।

  • समाज का विकृत रूप

    आज मन बड़ा द्रवित हुआ , सोचा सबको बतला दूं,
    समाज का एक ऐसा भी रूप सोचा सब को दिखला दूं,
    बड़ा परेशान पिता था बेटी की शादी के लिए ,
    ना जाने कितने लड़के आए उसकी बेटी को देखने के लिए,
    कोई सांवली कह देता, किसी ने नाटी कहकर ठुकराया,
    कोशिश जारी रही और एक रिश्ता नजर आया ,
    कर दी बेटी की शादी सुंदर सा था घर बसाया ,
    घर पहुंची बेटी बहू बनकर तो सब ने प्यार से अपनाया ,
    2 साल अभी बस बीते पोते की खुशी में सब जीते

  • एक बेटी की करुण पुकार

    क्यूँ आई दुनिया में मैं मां ,
    जब जिल्लत जग की सहना था ,
    मानव समाज के नियमों के ,
    ताने बाने में रहना था ।
    गर बेटा मैं भी होती तो ,
    मेरा मन यूं क्रंदन ना करता ,
    गर लाल तूने जाया होता ,
    यह घर खुशियों से तेरी झोली भरता ,
    घर वालों के तानों से मां,
    तेरा मन छलनी ना होता ,
    मिलते तुझको सुख के साधन ,
    गर जन्म मेरा इस जग में ना होता ।
    मत इतरा इतना ऐ इंसान तू,
    एक बात मैं तुझको बतला दूं ,
    मुझसे ही है अस्तित्व तेरा,
    यह परम सत्य ना ठुकरा तू,
    बेटियां जो जग में ना होंगी ,
    तो बहू कहां से लाओगे ,
    अपनी अस्मिता बचाने को ,
    अपना वंश कैसे बढ़ाओगे ??

  • बौद्धिक संपदा (दिवस)

    है अनमोल धरोहर ये अपनी बौद्धिक संपदा
    कर सकता इसे कोई इसे क्षीण नहीं ,रहती साथ में सर्वदा
    कोई नया काज करें , या कोई हो स्रजित् अविष्कार
    हो कोई कलात्मक कार्य , या हो विचारकों के विचार
    हो कोई नयी क्रति कलात्मक , या कोई संगीत आत्मक
    जिन्हे व्यक्ति करे स्वयं बौद्धिक श्रम से उत्पादित
    करके कुछ नया प्रतिपादित
    है उसे बौद्धिक संपदा का अधिकार
    लोगों की नयीं खोजे हो नवाचार ।
    इनका उपयोग कर बढा सकते हम अपनी धन संपदा !!
    क्यों रौब दिखाते हम पुरखों की विरासत पर
    कुछ लोग लडते रहते हैं झूठी सियासत पर
    इसे कोई भी छीन नहीं सकता आप की भी इजाजत पर
    आओ कुछ नया करें ,और नाज करें खुद की बनाई
    नयी विरासत पर
    अपनी बौद्धिक संपदा को अपनी विरासत बनाये।
    आओ बौद्धिक संपदा दिवस मनायें
    ——✍️—– एकता

  • धरती माता

    धरती माता ! धरती माता !
    करूँ माँ कैसे मैं तेरा गुणगान,
    आज तो निकली जा रही है सबके प्राण |
    आज हर शै की रौनक जा चुकी है ,
    चारो तरफ उदासी छा चुकी है |
    कल तक चारो तरफ हरियाली ही हरियाली छाई थी |
    देखकर ऐसी खुशहाली धरती माता की खुशी से आँखे भर आई थी |
    पर आज का मंजर ही कुछ और है |
    कल तक बात कुछ और था ,और आज का दौर ही कुछ और है |
    आज सांसो में अजीब- सी घुटन है ,
    ना जाने कोरोना वायरस जैसी तबाही का कौन सा ये चलन है |
    पहले स्वच्छ हवा जीवन में रंग भरा करती थी ,
    पर आज वहीं हवा प्रदूषित होकर जान लिया करती है |
    आज लाशों की ढ़ेर लगी है,
    कहीं बेटे, तो कहीं माएँ रो पड़ी है |
    मैं पूछती हूँ कहाँ गयी तेरी रंग-बिरंगी खुश्बू से भरी हरियाली,
    किसने छीन ली तुझसे तेरी खुशहाली |
    धरती माता ! आज मैं करूँ तेरा क्या बखान,
    पेड़ कट रहे है, बन रहें है फैक्टरी और मकान|
    चिमनिंयों से निकलते धुएँ अब पूरी धरती को प्रदूषित करने की वजह बने है ,
    कितनों के हाथ अब खून से सने है |
    आओ! हर कोई पेड़ लगाने का प्रण ले,
    जीव-जन्तु और वन्य प्राणियों को एक नया जीवन दे |
    प्रकृति की विकृति जैसे सुनामी ,बाढ़ और प्रदूषित वातावरण बिगाड़ रही है अच्छी-खासी स्थिति,
    जीवन अब शून्य हो रहे है,
    पाप भी अब पूण्य हो रहे है |
    आओ ! धरती माता को आज बचाएँ,
    इसके लिए अपने हाथों से सभी एक पेड़ लगाएँ|
    फिर से धरती माता को स्वच्छ व निर्मल बनाएँ |
    एे! कोरोना वायरस का कहर तुझे अब जाना होगा ,
    सबको मिलकर इस डर को हर किसी के अंदर से भगाना होगा |
    ये पावनभूमि संत-महात्माओं का जन्मस्थल है
    गंगा जैसी पवित्र नदी की बहती यहाँ शीलत जल है |
    आज हॉस्पिटलो में ऑक्सीजन की कमी हो रही है ,
    पर वहीं ऑक्सीजन देने वाले पेड़ों को काटने में कुछ लोगो की आँखो में नही है |
    आज शुद्ध हवा के लिए मानव तड़प रहा है ,
    जैसे उससे उसका संसार बिछड़ रहा है |
    धरती माता !आज मैं करूँ मैं आपका क्या बखान,
    जबकि सारी धरा ही बन रही हैआज शमशान |
    तेरे बखान के लिए शब्द हलक से उतर नही रहें ,
    तबाही का है आज एेसा मंजर कि जनजीवन सुधर नहीं रहे है |
    कोई तो इस धरा की रौनक लौटा दो,
    हर शै को फिर से महका दो |
    इस धरा को मरूभूमि बनने से बचा लो |
    अब कहाँ रहा नीला अंबर खुला आसमान,
    तड़प-तड़प कर दम तोड़ रही है तेरी संतान |
    धरती माता! धरती माता !
    तेरा अब करूँ मैं क्या बखान ,
    मुझको अब कुछ समझ नहीं आता |

  • दुर्योधन कब मिट पाया:भाग-1

    जब सत्ता का नशा किसी व्यक्ति छा जाता है तब उसे ऐसा लगने लगता है कि वो सौरमंडल के सूर्य की तरह पूरे विश्व का केंद्र है और पूरी दुनिया उसी के चारो ओर ठीक वैसे हीं चक्कर लगा रही है जैसे कि सौर मंडल के ग्रह जैसे कि पृथ्वी, मांगल, शुक्र, शनि इत्यादि सूर्य का चक्कर लगाते हैं। न केवल  वो  अपने  हर फैसले को सही मानता है अपितु उसे औरों पर थोपने की कोशिश भी करता है। नतीजा ये होता है कि उसे उचित और अनुचित का भान नही होता और अक्सर उससे अनुचित कर्म हीं प्रतिफलित होते हैं।कुछ इसी तरह की मनोवृत्ति का शिकार था दुर्योधन प्रस्तुत है महाभारत के इसी पात्र के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डालती हुई कविता “दुर्योधन कब मिट पाया”  का  प्रथम भाग। 

    रक्त से लथपथ शैल गात व शोणित सिंचित काया,
    कुरुक्षेत्र की धरती  पर लेटा  एक  नर   मुरझाया।
    तन  पे  चोट लगी थी उसकी  जंघा टूट पड़ी थी त्यूं ,
    जैसे मृदु माटी की मटकी हो कोई फूट पड़ी थी ज्यूं।

    भाग्य सबल जब मानव का कैसे करतब दिखलाता है ,
    किचित जब दुर्भाग्य प्रबल तब क्या नर को हो जाता है।
    कौन जानता था जिसकी आज्ञा से शस्त्र उठाते  थे ,
    जब  वो चाहे  भीष्म द्रोण तरकस से वाण चलाते थे ।

    सकल क्षेत्र ये भारत का जिसकी क़दमों में रहता था ,
    भानुमति का मात्र सहारा  सौ भ्राता संग फलता था ।
    जरासंध सहचर जिसका औ कर्ण मित्र हितकारी था ,
    शकुनि मामा कूटनीति का चतुर चपल खिलाड़ी था।

    जो अंधे पिता धृतराष्ट्र का किंचित एक सहारा था,
    माता के उर में बसता नयनों का एक सितारा था।
    इधर  उधर  हो जाता था जिसके कहने पर सिंहासन ,
    जिसकी आज्ञा से लड़ने को आतुर रहता था दु:शासन।

    गज जब भी चलता है वन में शक्ति अक्षय लेकर के तन में,
    तब जो पौधे पड़ते  पग में धूल धूसरित होते क्षण में।
    अहंकार की चर्बी जब आंखों पे फलित हो जाती है,
    तब विवेक मर जाता है औ बुद्धि हरित  हो जाती है।

    क्या धर्म है क्या न्याय है सही गलत का ज्ञान नहीं,
    जो चाहे वो करता था क्या नीतियुक्त था भान नहीं।
    ताकत के मद में पागल था वो दुर्योधन मतवाला,
    ज्ञात नहीं था दुर्योधन को वो पीता विष का प्याला।

    अजय अमिताभ सुमन:सर्वाधिकार सुरक्षित

  • दुर्योधन कब मिट पाया:भाग-2

    है कि श्रीकृष्ण की अपरिमित शक्ति के सामने दुर्योधन कहीं नही टिकता फिर भी वो श्रीकृष्ण को कारागृह में डालने की बात सोच सका । ये घटना दुर्योधन के अति दु:साहसी चरित्र को परिलक्षित करती है । कविता के द्वितीय भाग में दुर्योधन के इसी दु:साहसी प्रवृति का चित्रण है। प्रस्तुत है कविता “दुर्योधन कब मिट पाया” का द्वितीय भाग।

    था ज्ञात कृष्ण को समक्ष महिषी कोई बीन बजाता है,
    विषधर को गरल त्याग का जब कोई पाठ पढ़ाता है।
    तब जड़ बुद्धि   मूढ़ महिषी  कैसा कृत्य रचाती है, 
    पगुराना सैरिभी को प्रियकर वैसा दृश्य दिखाती है।

    विषधर का मद कालकूट में विष परिहार करेगा क्या?
    अभिमानी का मान दर्प में निज का दम्भ तजेगा क्या?
    भीषण रण जब होने को था अंतिम एक प्रयास किया,
    सदबुद्धि जड़मति को आये शायद पर विश्वास किया।

    उस क्षण जो भी नीतितुल्य था गिरिधर ने वो काम किया,
    निज बाहों से जो था सम्भव वो सबकुछ इन्तेजाम किया।
    ये बात सत्य है अटल तथ्य दुष्काम फलित जब होता है,
    नर का ना उसपे जोर चले दुर्भाग्य त्वरित  तब होता है।

    पर अकाल से कब डर कर हलधर निज धर्म भुला देता,
    शुष्क पाषाण बंजर मिट्टी में श्रम कर शस्य खिला देता।
    कृष्ण संधि   की बात लिए  जा पहुंचे थे हस्तिनापुर,
    शांति फलित करने को तत्पर प्रेम प्यार के वो आतुर।

    पर मृदु प्रेम की बातों को दुर्योधन समझा कमजोरी,
    वो अभिमानी समझ लिया कोई तो होगी मज़बूरी।
    वन के नियमों का आदि वो शांति धर्म को जाने कैसे?
    जो पशुवत जीवन जीता वो  प्रेम  मर्म पहचाने कैसे?

    दुर्योधन  सामर्थ्य प्रबल  प्राबल्य शक्ति  का  व्यापारी,
    उसकी नजरों में शक्तिपुंज ही मात्र राज्य का अधिकारी।
    दुर्योधन की दुर्बुद्धि ने कभी ऐसा भी अभिमान किया,
    साक्षात नारायण हर लेगा सोचा  ऐसा  दुष्काम किया।

    अजय अमिताभ सुमन:सर्वाधिकार सुरक्षित

  • कुल्हाड़ी मत चलाना

    कहा पेड़ ने मानव से
    कुल्हाड़ी मत चलाना
    मैं तुम्हारा पांव हूँ
    जब जाओगे मझधार में
    मैं तुम्हारी नाव हूं
    बचोगे तुम भी नहीं मुझे मारकर
    मैं तुम्हारी छाँव हूं
    प्यासे मर जाओगे
    मै बदलो को लुभाने वाला t
    ठाव हूं
    मर जाओगे प्रदूषण से
    मै तुम्हारी आखरी
    दाँव हूं
    मुझे पालो काल से बचाउंगा
    मै तुम्हारा प्यारा गाँव हूं
    कुल्हाड़ी मत चलाना
    मैं तुम्हारा
    शुकून, सुख, शांति, समृद्धि से
    भरने वाला घाव हूं
    कुल्हाड़ी मत चलाना

  • हे! बापू आओ

    अंग्रेजों के
    साहित्य और विचार
    हमारे मन मस्तिष्क में बैठे हैं
    डेरा डाल
    फूट डालो शासन करो नीति जैसे
    है हाल
    हमारी संस्कृति उपेक्षित है
    हम उलझे हैं
    अंधे अनुकरण के जाल
    हिंदी भाषा शर्माती है
    अंग्रेजी मालामाल
    अंग्रेजो की हिंसा का जहर फैल रहा ज्यों व्याल
    शोषण का पोषण कर दिया है कमाल
    वही पेड़ काट रहे बैठे हैं
    जिसकी डाल
    भेद वाद जारी है
    बज रहे हैं ताल
    भ्रष्टाचार दंगो के घूमते
    दलाल
    असहयोग आंदोलन कर रहे
    देश के लाल
    भारत माता हुई फिर से
    बेहाल
    अपने ही काट रहे अपनो का
    भाल

    कैसे सजाए भारत मां की
    आरती की
    थाल

  • जमाना

    बीत गया है ख़ुशी और गम बांटने का जमाना
    पागलपन है अकेले ही हंसना रोना गुनगुनाना
    काटते हैं ये जब इन्हें बांटते नहीं हैं
    कितना मुश्किल है अब सुनना और सुनाना
    अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है मगर सब मौन
    कोई मतलब नहीं रहा जिए या मरे जमाना
    कह नहीं पा रहे कहे बिन रह नहीं पा रहे जारी है जीवन में सुख दुख का आना जाना
    खड़े हैं मेले में अकेले अकेले से
    कितना मुश्किल है अपने को पहचान पाना
    मर गये हैं संवाद और संवेदना आज के इस दौर
    बेहोश समझ कर मकसद था इन्हे जीवित कराना
    मशीनों से मुहब्बत कहे या यंत्रों की गुलामी
    पानी सा फोन दिखता और मीन सा जमाना
    दुनिया ये काम में अब व्यस्त है इतना
    प्रचलन में नहीं लोरिया सुनना व सुनाना
    बोझा सा ढोके थक रहे अपनों को अपने लोग
    गूगल गुरु से पूंछःते वृद्ध आश्रम ठिकाना
    नाते व रिश्ते आज औपचारिक हुए
    भूलते ही गए लोग अब इनको निभाना
    नफरत की लताओ से पादप घिरे हुए
    कितना है मुश्किल शाख से अब वंशी बनाना

    O

  • कड़वा भी पीजिये

    कभी-कभी
    हमारी बात पर भी गौर कीजिए,
    मीठे के साथ- साथ में
    कड़वा भी पीजिये।
    अंगूर, सेब, आम सब
    आम बात है,
    पंचरत्न नीम का भी
    स्वाद लीजिये।
    सूखा पड़े न वक्ष पर
    अश्कों से सींचिये,
    सही गलत के बीच में
    रेखाएं खींचिये।
    मीठे में व्याधियां हैं
    कड़वे में है दवाई
    कड़वे ने आज तक
    कई व्याधियां मिटाई।
    कड़वे से नफ़रतें हैं
    मीठे से प्यार जग को
    रक्षक है तन का कड़वा
    यह भान है न जग को।
    कड़वे वचन भले ही
    लगते बुरे हमें हैं,
    लेकिन सही दिशाएं
    देते वही हमें हैं।
    कभी-कभी
    हमारी बात पर भी गौर कीजिए,
    मीठे के साथ- साथ में
    कड़वा भी पीजिये।

  • एक बूढ़ी अम्मा का आग्रह

    एक बूढ़ी अम्मा का घर आना हुआ,
    बातों का सिलसिला जब शुरू हुआ,
    अम्मा कहती जब से ई मोबाइल आया,
    वयस्कों संग बच्चा भी हमसे बात करने से कतराया,
    जैसे ही सुबह हुई बच्चों ने बस मोबाइल चलाया,
    गलती केवल बच्चों की ही नाहीं ,
    मोबाइल तो मां-बाप ने ही बच्चों को पकड़ाया
    ई मोबाइल के चक्कर में बच्चा भी सारे संस्कार भुलाया,
    जहां हंसी ठिठोली होती थी वहां अब सन्नाटा छाया,
    हमका भी कुछो अब याद नहीं, न जाने कब हमने था
    बच्चन का कहानियां सुनाया,
    कहती अम्मा जब था कीपैड फोन आया,
    बड़ा खुश हुआ मेरा मन ,घर बैठे जब सब से बात कर पाया
    पर सूना हुआ मेरा आंगन, जब से ई एंड्राइड फोन आया
    अम्मा भी चाहें हंसना और बच्चों के संग बतियाना,
    हम जानित हैं मोबाइल भी है जरूरी
    पर थोड़ा समय साथ में हमहूं चाही बिताना,
    अपने बुजुर्गों के संग थोड़ा समय व्यतीत करें
    ताकि हम बुजुर्ग भी खुशहाल रहें,
    बस बूढी अम्मा ने आप सबको यही संदेशा भिजवाया है।
    _____✍️____ एकता गुप्ता

  • एक दिन सब ठीक होगा देखना

    आज कल परसों
    कभी तो पायेंगे
    कुछ नई आशा की
    किरणें दोस्तों।
    कब तलक भय
    का रहेगा राज यह
    कब तलक फैली रहेगी वेदना।
    कब तलक होगा
    रुदन चारों तरफ
    कब तलक साँसों के
    संकट से घिरी,
    इस तरह बिखरी रहेगी वेदना।
    एक दिन निकलेगा
    सूरज वैद्य बन,
    एक दिन हर देगा सारी वेदना,
    तब तलक साँसें
    बचाना यत्न कर,
    एक दिन सब ठीक होगा देखना।

  • न घड़ी एक भी गँवानी है

    नींद पलकों में भरी
    स्वप्न आंखों में सजे
    आज आलस्य त्याग
    और कल मिलेंगे मजे।
    आज है काली निशा
    तारे तक खो गए हैं
    ठोस चट्टान भी
    देख यह रो गए हैं।
    ये हवा चल रही है,
    मगर है दूषित सी
    श्वास लेना है कठिन
    आस है अपूरित सी।
    आस पूरित हो
    खूब मेहनत कर,
    न घड़ी एक भी गँवानी है।
    है कठिन यह समय
    मगर तूने
    राह मंजिल की
    अपनी पानी है।

  • अर्थ का महत्व है

    अर्थ का महत्व है
    शब्द तो शब्द है,
    बिना अर्थ के शब्द
    निरर्थक है।
    अर्थ कुछ भी
    लगाया जा सकता है,
    निश्चित अर्थ
    या निर्मित अर्थ।
    चेहरे के भाव का अर्थ
    मूँछों में ताव का अर्थ
    मझधार में नाव का अर्थ
    आ रहे चाव का अर्थ
    बस शब्द के
    सार्थक होने की शर्त,
    शिखर हो या गर्त,
    मगर बात का
    कुछ न कुछ हो अर्थ,
    पाप और पुण्य की
    सच और झूठ की,
    दान औऱ लूट की
    शब्दावली का अर्थ
    अपनी अपनी रुचि के
    अनुसार लगता सा,
    प्रस्फुटित होता रहता है।
    अर्थ है तब शब्द है
    या शब्द से अर्थ है,
    शब्द अर्थ का समन्वय
    जिन्दगी की शर्त है।

  • वसुधा को हरा-भरा बनाए हम

    जब सांसे हो रही है कम ,आओ फिर से वृक्ष लगाएं हम,
    आओ नमन करे हम वसुधा, को जो मिटाती है हम सबकी क्षुधा को,
    जो बिना भेदभाव हम सबको पाले,वह भी चाहे पेड़ों की बहुधा को,
    नये पेड़ों को फिर से रोपकर, इसे फिर बनाए रत्नगर्भा हम,
    आओ फिर से वृक्ष लगाएं हम।
    एक अकेले से कुछ ना होगा,हमें चाहिए सबका साथ,
    पृथ्वी मां की रक्षा को फिर से बढ़ाओ अपने हाथ,
    फिर कमी न कुछ जीवन में होगी,होगी तरक्की दिन और रात,
    खुद जागें औरों को भी जगाए हम,
    आओ फिर से वृक्ष लगाएं हम।
    मानो तो माटी है मानो तो यह है चंदन,
    हम सब मां को मनाएंगे और करेंगे फिर से वंदन,
    पृथ्वी को हरा-भरा करने को निछावर कर दें अपना तन मन,
    पृथ्वी मां जब मुस्काएगी तब दूर होंगे सारे गम,
    आओ फिर से वृक्ष लगाएं हम।
    ऑक्सीजन की कमी यूं बनी हुई,सांसे यूं सबकी थमी हुई,
    लोगों का बिछड़ना शुरू हुआ,आंखों में फिर से नमी हुई,
    ऑक्सीजन की कमी को दूर करें यूं हम,
    आओ फिर से वृक्ष लगाएं हम।
    जब धरती मां मुस्काएगी,परेशानियां स्वयं दूर हो जाएंगी,
    एक दिन की तो यह बात नहीं,होगी यदि इनकी देखभाल जीवन में खुशियां आएंगी,
    एक दिन के पृथ्वी दिवस से क्या होगा,आओ रोज पृथ्वी दिवस मनाएं हम।
    आओ फिर से वृक्ष लगाएं हम।।
    (पृथ्वी दिवस पर रचित मेरी कविता का संपूर्ण अंश प्रेषित ना होने के कारण मैं यह कविता आज पुनः प्रेषित कर रही हूं।)

  • तैयार खड़े हैं

    तोहमत लगाने की आदत
    कब की छूट चुकी है
    मैं गुलाम ही सही मुझे
    सबकी आजादी की पड़ी है
    मुक्त होती है रुह मरकर ही
    मुझे मुक्त होना है जीते जी ही
    इक बीज किसी फल का नहीं
    कहीं यूं ही फेंकता हूं मैं कहीं
    जमीन अपनी हो या परायी
    हरियाली कि उम्मीद न छोड़ता हूं कहीं
    पर्यावरण में सुधार के लिए ही
    शायद मैं भविष्य में अगर जिंदा हूं
    जिंदगी में बीत चुकी है जो गलतियां
    उसके लिए तब तभी ही शर्मिंदा हूं
    हर रोज बदल जाते हैं इंसान यहां
    क्यूं पुरानी गलतियों के लिए कोसते हैं
    बीते हुए कर्मों की सजा भोग रहें हैं
    वर्तमान के कर्मों के लिए तैयार खड़े हैं

  • भविष्य को आवाज

    कूड़े के ढेर में
    खोजने में लगे थे
    नन्हें नन्हें हाथ,
    तन्मयता के साथ,
    जरूरत की चीजें,
    दे रहे थे सामाजिक
    जीवन को,
    सच्ची सीखें।
    पूछा तो बोले
    उनके घरों से
    निकला हुआ यह कूड़ा है
    मगर हमारे लिए
    कूड़ा नहीं
    इस आशा से जुड़ा है
    कि इसमें कुछ होगा,
    जो मदद करेगा जीने में,
    भूख है, इसलिये
    खोजना है इंतज़ाम
    क्या पता उनका फेंका हुआ
    आ जाये हमारे काम।
    प्लास्टिक की बोलतें
    बेचकर
    एक गुड़िया खरीदी है
    पिछली बार,
    एक थैली तो ऐसी थी
    जिसमें परौठे थे चार।
    एक चाबी वाला घोड़ा था
    घोड़ा ठीक था लेकिन
    चाबी टूटी थी,
    मगर मेरी किस्मत रूठी थी
    वो दूसरे बच्चे को मिल गया,
    उसका चेहरा खिल गया।
    मैं भी ढूंढ रहा हूँ
    यह टूटी फूँकनी मिली है
    उसे फूंक रहा हूँ,
    सीटी बजाकर
    भविष्य को आवाज दे रहा हूँ।
    अपनी इच्छा की पूर्ति को
    संघर्ष का आगाज कर रहा हूँ,
    आज कीचड़ में सना हूँ
    कल कमल बन खिलूँगा
    एक दिन आपसे
    इंसान बन मिलूँगा।

  • प्रेम और सौंदर्य

    आकाश की सुंदरता बढ़ाता कपासी बादल नहीं
    धरती का प्रियतम है वह काला बादल जो
    अपने प्रेम से करता है धरा का शृंगार..
    कानों में रस घोलती सुरीली तान फूटती है
    काली कुरूप कोयल के कण्ठ से..!!

    कलियों का संसर्ग होता है कुरूप भ्रमर से
    कोमल गुलाब पनपता है काँटों के बीच,
    वहीं कमलदल फूलते हैं कीचड़ में..
    गहरी चंचल आँखों से कहीं अधिक गहन प्रेम
    पाया जाता है किसी की प्रतीक्षा से
    पथराई सूनी आँखों में…!!

    हम प्रेम को खोजते हैं अपनी शर्तों, आकांक्षाओं
    और नियमावलियों की परिधि में
    परंतु प्रेम हमारे समक्ष आता है समस्त निर्धारित
    मानदण्डों की सीमाएँ लांघ कर
    अपनी दृष्टि पर लालसाओं का आवरण डाले
    हम..उसे पहचान नहीं पाते..!!

    विरोधाभासों में कहीं अधिक प्रबल होती है
    प्रेम की उत्पत्ति की संभावना…!!
    वास्तव में प्रेम की व्याख्या अधूरी है इस तथ्य की स्वीकार्यता के बिना..
    “प्रेम में सौंदर्य है, किन्तु प्रेम केवल सौंदर्य में नहीं है”..!!

    ©अनु उर्मिल ‘अनुवाद’
    (25/04/2021)

  • अजगर

    दसो दिशाओ मे
    बड़े बड़े मोटे मोटे अजगर
    पड़े हैं तैयार
    उत्सुक हैं निगल जाने को संसार
    वो हमारे पास भी आते हैं
    और कभी हम अपने काम से उनके पास चले जाते हैं
    इस प्रकार वो अपना संगठन चलाते हैं
    निर्दोष जान गवाते हैं
    और वो पैसा कमाते हैं
    पैसा से ये नर भक्षी दानवो का परिवार चलाते हैं
    अक्सर अनचाहे अजगर ये एक न एक दिन मिल ही जाते हैं

  • राजनीति

    आ गया साल है पांचवा जानिए
    छा रहा है सहज मेघ ये मानिए
    बूंद दो भी बरस के न जाएगा ये
    मोर के जैसे शोर को छानिए
    घर बनेगा उन्ही का हकीकत यही
    पैर के नाप की ही चद्दर तानिेए
    भूल जाएंगे वो तुझको दान को
    वेवफा था सनम ज्यों उसे जानिए
    और बाते बनाना उसे आ रहा
    शोषको की कतारों खड़ा जानिए
    राजनीती यही है न कोई सगा
    आतंको की गढ़ी है पहिचानीए

  • प्रभात का संदेशा

    बह रही पवन ,खिल रहे सुमन,
    कितना अदभुद यह नजारा है,
    छंट गया तिमिर, बीती यामिनी,
    रवि की किरणों ने पैर पसारा है।
    नभ में चिड़ियाँ,कलरव करतीं,
    गुंजन यह मधुरिम छाया है,
    आलस्य त्याग हे मनुज जाग
    पूरब से संदेशा आया है,
    धरती का आंचल महक रहा,
    नूतन यह सवेरा आया है,
    करें धन्यवाद उस ईश्वर का,
    जिसने संसार रचाया है,
    जिसने संसार रचाया है।

  • दर्पण

    आज भी नहाते हैं लोग
    सुबह उठकर
    फिर दर्पण के सम्मुख जाते हैं
    दर्पण मे देखकर चेहरा अपना
    मुह बनाते हैं, रोते हैं, चिल्लाते हैं
    फिर उस दर्पण को छोड़ कर या तोड़कर
    बड़े आकार का दर्पण खरीद लाते हैं
    परंतु इसके सम्मुख भी जाकर
    वही प्रक्रिया दुहराते हैं
    मांग बढ़ती देख बाजार में
    दर्पण के प्रकार और आकार बढ़ा दिए जाते हैं
    क्या हम सचमुच वैसे ही है
    जैसा ये दर्पण दिखाते हैं
    हां मे जवाब सुनकर
    मुह बनाते हैं, रोते हैं, चिल्लाते हैं
    मगर दर्पण के सिवाय
    अपने आसपास किसी और को नहीं पाते हैं

  • पर्यावरण के दोहे

    पर्यावरण बचाइए, हे मानव समुदाय
    सुख समृद्धि शांति, का है जो पर्याय
    नदिया पर्वत वन और, वन्य जीव समुदाय
    मानव दानव से हमे, कोई लेव बचाय
    धरा वायु जल सब हुए, दूषित सुनो पुकार
    प्रकृति रोग वर्षा करे, जगत हुआ बीमार
    प्रकृति अंग लकवा हुआ, दुखी नहीं संतान
    वृद्धा आश्रम छोड़ कर, कहे जाप भगवान्
    एटम बम के पालना, झूले राजकुमार
    बापू गौतम बुद्ध की, सभा में हाहाकार
    झरना नदिया बाग वन, पर्वत और पठार
    रक्षा कर अस्तित्व की, कहत पुकार पुकार

  • राहुल और सिमरन का वार्तालाप

    राहुल बोला..
    यह कोरोना कहाँ की बीमारी आई है,
    इसने कैसी आफत मचाई है।
    इन्सान, इन्सान से डरने लगा,
    अदृश्य जीवों से मरने लगा।
    बस घर में ही पड़े रहो,
    चलाते रहो मोबाइल।
    ना कहीं आने के रहे,
    ना कहीं जाने कि रहे।
    ढीली हुई है पेंट भी
    निकल-निकल भगती है।
    कमजोर किया है कोरोना ने इतना,
    अब तो हर चोट दिल पर लगती है।
    फ़ेफ़ड़ों ने भी दे दिया जवाब है,
    यकीन मानो यह बीमारी बड़ी खराब है।
    फिर राहुल ने देखा..
    बिना मास्क के ही,
    सिमरन जा रही थी।
    राहुल ने पूछा सुन जरा,
    मास्क कहाँ है बता तेरा।
    क्रोध में झिड़क गई सिमरन,
    राहुल को हुई बहुत उलझन।
    अब राहुल सोच रहा है,
    ऐसा क्या बोल दिया मैंने,
    जो यूँ झिड़क गई सिमरन॥
    ______✍गीता

  • मनुज अब सुमिरन करता है

    श्रीराम हरो पीड़ा
    मनुज अब सुमिरन करता है।
    जहां तहाँ फैली महामारी,
    दुखी हुई प्रजा यह सारी,
    दूर करो रजनी अंधियारी,
    सुमिरन करता है,
    मनुज अब सुमिरन करता है।
    संकट से घिर गए हैं सारे
    तुम न उबारो तो
    कौन उबारे,
    मानव जाति पड़ी विपदा में,
    सुमिरन करता है
    मनुज अब सुमिरन करता है।
    फैल गया सब ओर रोग है
    एक में फैला कई में फैला
    रोको अब इस संक्रमण को
    सुमिरन करता है,
    मनुज अब सुमिरन करता है।
    श्वास को तरसा
    वायु थम रही,
    दम घुटता रह गया मनुज का,
    ऐसे में एक आस बने हो,
    सुमिरन करता है
    मनुज अब सुमिरन करता है।
    कवि की कलम शारदा बसती
    लेकर आश्रय उनका,
    माँ के चरणों में वंदन कर
    सुमिरन करता है,
    मनुज अब सुमिरन करता है।
    कहना सुनना कठिन हुआ है
    एक ही अस्त्र बची दुआ है,
    आज बता दो
    कौन दवा है,
    सुमिरन करता है
    मनुज अब सुमिरन करता है,
    श्रीराम हरो पीड़ा
    मनुज अब सुमिरन करता है।
    —– डॉ0 सतीश चंद्र पाण्डेय,चम्पावत, उत्तराखंड

  • हे अन्नपूर्णा बचा लो हमें तुम!

    अपने लोक की ये कथा है, अपनी मां धरनी बसुन्धरा है
    निज सुत की करनी से दुःखी हो
    व्याकुल हो त्राहि-त्राहि करने लगी वो
    तब उसने तप का लिया सहारा
    त्रिलोक के स्वामी को जाके पुकारा
    कहां छिपे हो, हे जग के रचयिता
    कब हरोगे संताप इस मन का
    प्रभु ने वरदान अवनी को दिया तब
    अवतार ले संघार असूरों का किया जब
    हे रत्नगर्भा कहां सो रही हो
    सुत के संकटों से मुंह मोड़ रही हो
    पल-पल आंचल के सितारे झङ रहे हैं
    खोई कहां तूं, कैसे मनुज मर रहे हैं
    तेरे गोद में पलने वाले, मिट्टी से खेलने वाले
    असमय हो चले अनजाने काल के हवाले
    इस संकट से उबारो से माता
    मां – पुत्र का, हमारा है नाता
    हम पुत्र हैं, कुपुत्र हो चले थे
    तेरी संपदा का दोहन कर रहे थे
    विरासत में मिली थी जो जीवन के सलीके
    सतत रख सके न, चढ़े इच्छाओं के बलि पे
    अब सज़ा से उबारो हमें तुम
    नतमस्तक हैं, अन्नपूर्णा बचा लो हमें तुम!

  • समझ में आ ही गया

    बेटी और बेटे में इक फर्क समझ में आया
    ससुराल में रहकर भी मैके का साथ निभाया।
    दूर रहकर भी ‌मन‌से ममत्व नहीं मिट पाया
    पास रहकर भी यह पुत्र समझ नहीं पाया।
    पुत्र को डर यह कैसा,पत्नी को दोष लगाया
    कर्म पथ से पीछे हट, कर्त्तव्य से नज़र चुराया।
    मां का राजा बेटा, जब रानी घर ले आया
    दो पाटे में बंटकर, सामंजस्य बना न पाया।
    गृहस्थी बसाने चला प्रवासी बनकर
    मां बाबा पे, कैसे मिथ्या दोष मढ़कर
    उनकी कमज़ोरी का लाठी बन नहीं पाया
    बेटी और बेटे में इक फर्क समझ में आया।
    कोरोना का कहर लौटाकर
    ले आया गांव भगाकर
    बन्दिशों से भागे थे बचकर
    पर‌ लौटे हैं क्या अपने बनकर
    कशमकश का दौङ उभरकर आया
    बेटी और बेटे में इक फर्क समझ में आया।

  • एक थी नारी

    एक थी नारी
    सबको थी प्यारी
    सब चाहते थे हो जाए हमारी
    ममता की मूर्ति और दुनिया पुजारी
    तभी एक दिन दवे पांव आया नरवाद
    ममता के मंदिर में मचाया हाहाकार
    स्वार्थ और अहं से जो था लाचार
    तब तक शांति प्रिय नारी ने कर लिया था उसकी अधीनता स्वीकार
    उस पर होने लगे जुल्म अत्याचार
    सहनशीलता की सीमा पार
    ना राम को बुलाया ना कृष्ण की पुकार
    तरस खा कर नर वाद ने उसे दिया शिक्षा का अधिकार
    ्‍यही बना उसका अचूक हथियार
    अपने अधीन किया फिर संसार
    एक है नारी ढोती जो जग का भार
    देती है प्यार करती उपकार
    तब ‘वाद, ‘मर गया

  • प्रथ्वी के सौंदर्य वर्णन का उल्लास

    कई दिनो से सोच रहा था
    पंत की तरह प्रकृति चित्रण करूं
    पद्मकार की तरह ऋतु वर्णन करूँ
    परंतु एक दिन सुबह का अखबार पढ़कर मेरा विचार बदल गया
    अखबार का शीर्षक था
    मनुष्य ने प्रकृति का अपहरण कर लिया है
    फिरौती मे मांगा है
    बहु मंजिला इमारतें
    उद्योगों के लिए स्थान
    अधिक उत्पादन का वरदान
    वन्य जीवों का वालीदान
    भूमि का टुकड़ा जिसमें बना सके श्मशान
    और अंत में प्रकृति के प्राण
    प्राण बचाने के लिए प्रकृति ने उसकी उपरोक्त शर्ते मान लिया था
    इसलिए मनुष्य ने उसे दे दिया प्राण दान
    लेकिन प्रकृति के शरीर के टुकड़े टुकड़े कर के
    या तो बेंच दिया या तो दफनाया
    या फिर जला कर राख कर दिया
    तब तक मेरा प्रथ्वी के प्रकृति चित्रण का उल्लास
    शोक में तब्दील हो चुका था

  • कोरोना से पीड़ित है देश

    देश में मचा हाहाकार है,
    बीमारों की भरमार है।
    ऑक्सीजन और दवा की कमी हुई,
    चिकित्सक भी लाचार हैं।
    रैड लिस्ट में आया हिंदुस्तान,
    बचा लो बीमारों की जान।
    कोरोना से पीड़ित है देश,
    कोरोना लेकर आया है नया भेष।
    आधे से ज्यादा देश बीमार है
    कैसे इस स्थिति से निपटा जाए,
    यह संकट गहराता जाए।
    दिन-रात चिकित्सक कर रहे देखभाल हैं,
    रोग नियन्त्रण के बाहर हुआ
    रोगियों के बुरे हाल हैं।
    कोरोना ने बहुत पसारे पैर हैं,
    बिना मास्क के जो घूमेगा
    उसकी नहीं अब ख़ैर है।
    “दो गज़ दूरी, मास्क जरुरी”
    जो यह नियम अपनाएगा,
    वही अछूता रहे रोग से,
    वरना कोरोना की गिरफ्त में आ जाएगा॥
    _____✍गीता

  • हर सको दर्द दूजे का

    भीड़ के बीच में
    ख्याल खुद का रखो,
    हर सको दर्द दूजे का
    नुस्खा रखो।
    वेदना हो भले
    दिल के भीतर भरी
    मगर होंठ में आप
    मुस्कां रखो।
    यह न अहसास हो
    दूसरे को कभी
    आपका दिल
    गमों से भरा है बहुत,
    आपको देखकर
    सबको ऊर्जा मिले,
    आपको देखकर
    नव प्रेरणा मिले।
    दर्द आने न देना
    नयन बूँद तक,
    उसको भीतर सूखा दो
    उड़ा दो कहीं,
    जिन्दगी है गिने चार
    दिन की यहाँ,
    चार दिन को गँवाना
    गमों में नहीं।
    भीड़ के बीच में
    ख्याल खुद का रखो,
    हर सको दर्द दूजे का
    नुस्खा रखो।

  • बुढ़ापे की लाचारी

    आज कयी बच्चों के एक पिता को
    दवा के अभाव में तङपते देखा है
    ना उसके भूख की चिन्ता
    न परवाह उसकी बीमारी की
    गज़ब दास्तां है, बुढ़ापे की लाचारी की।
    बिस्तर पर पङे, पर बिछावन है नहीं
    वस्त्र के नाम पर, साफ धोती भी नहीं
    निगाहें तकती,किसी अपने की आहट की
    गज़ब दास्तां है, बुढ़ापे की लाचारी की।
    बेटा-बेटी कहने को अपने, झूठे सारे सपने
    समय के अभाव का रोना,अभी है कोरोना
    वधु घर पर आश है ससुर के दम निकलने की
    गज़ब दास्तां है बुढ़ापे की लाचारी की।
    पता नही क्यूं, हम इसकदर बदल जाते हैं
    जनक-जननी से ज्यादा,
    वाहरवालो की बातों पर आ जाते हैं
    औरों के दुःख में द्रवित,
    सहानुभूति के आंसू भी बहा जातें हैं
    पर अपनी जिम्मेदारियों से
    हमेशा इतर हो‌ मुंह चुङा जातें हैं
    अपनी कमी छिपा, डर नहीं ऊपर वाले की
    गज़ब दास्तां है बुढ़ापे की लाचारी की।
    बेटी की चाह नहीं रखते पुत्र की ललक मन में है
    पराया धन समझते, जगह नहीं अपने घर में है
    चाहत सेवा की लिए अलग कहीं ‌तङपती है
    मर्यादा के नाम,हमेशापिसती‌-सिसकती रहती है
    अब बारी है कुछ परम्पराओं को बदलने की
    गज़ब दास्तां है बुढ़ापे की लाचारी की।
    बेटी ही बहु बनती,‌स्नेह कहा छोङ आती है
    सास‌ भी‌ बहु को बेटी क्यूं नहीं ‌बना पाती है
    अहम आङे आता है, दूरियां बढ़ते जाती है
    घर एक है मगर, भावनाएं बिखरते जाती है
    कोशिश कैसे करें, इसे मिटाने की
    गज़ब दास्तां है बुढ़ापे की लाचारी की।

  • यह कैसा दिन आया है

    कैसा मंजर यह आया है,
    चहुंओर अंधेरा छाया है!
    कितने कुलदीपक बुझ ही गए,
    कितने परिवार यू उजड़ गए,
    गर नहीं सचेते अब भी तो,
    उठ सकता सिर से साया है,
    चहुंओर अंधेरा छाया है!
    कहीं ऑक्सीजन की कमी हुई,
    कहीं पल में सांसे उखड़ गई,
    यह मृत्यु का तांडव रुके यहीं,
    बेबसी से उबरें जल्द सभी,
    रुक जाए महामारी अब बस,
    जिसने चित्कार मचाया है,
    चहुंओर अंधेरा छाया है!
    जहां लाड- प्यार हमें मिलता था,
    वहीं दूर-दूर हम रहते हैं,
    स्पर्श न कर सकते हैं उन्हें,
    बरबस आंसू यह बहते हैं,
    प्रभु अपने पल में बिछड़ रहे,
    यह कैसा दिन दिखलाया है,
    चहुंओर अंधेरा छाया है!
    ईश्वर से प्रार्थना करती हूं,
    महामारी को जल्दी निपटा दो,
    दुख के बादल छंट जाए सभी,
    आशा की किरण अब दिखला दो,
    सब स्वस्थ रहें खुशहाल रहें,
    प्रार्थना में मेरी यह समाया है,
    चहुंओर अंधेरा छाया है!
    मेरी सबसे है अपील यही,
    सब घर पर रहो और स्वस्थ रहो,
    सब मास्क लगाओ और सभी,
    सामाजिक दूरी का पालन करो,
    मत करो अवहेलना नियमों की,
    इन्हें पालन करने का दिन आया है,
    चहुंओर अंधेरा छाया है!

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