संपादक की पसंद

हैसियत क्या थी मेरी…

हैसियत क्या थी मेरी पूछिए मत, बस किताब के कोरे पन्ने थे , लिखते रहे अपनी रूबानी, जब बनी ना कोई गजल ना कोई नज़्म, फटकर सिमटकर पैरों तले बस कुचले गए। »

कंघी

कविता- कंघी —————— कभी इसको रख गोदी मे रोटी देती थी, कभी इसको काजल कंघी तेल कराती थी, कभी इसको कंधो पर रख कर, मेले कि शैर कराती थी, थक! जाता था, लाल मेरा जब, रख सर पर गठरी गोदी मे लेके, कभी अपने मैके जाया करती थी| कभी इसको झूठ दिलाशा दे करके, खुद कामो मे लग जाती थी| बड़ा हुआ जब लाल मेरा, क्या क्या रंग दिखलाता है| कभी भुखे पेट मै सोती हु कभी कपड़ो के लिए रोती हु|... »

जज़्बाते – दिल

अजीब सी है ये ज़िन्दगी, कभी, फूलों सी कोमल लगी। कभी शमशीर की धार हुई, दिल के जज्बातों को जब- जब किया बयां, एक कविता हर बार हुई । »

तमाशा

तराशने वालों ने, पत्थर को भी तराशा है, नदानों के आगे हुआ, हीरे का भी तमाशा है। »

इन्सान हूँ इंसान समझो

इस तरह क्यों भेद का तुम भाव रखते हो, बताओ, मैं तुम्हारी ही तरह इन्सान हूँ इंसान समझो। मुफलिसी है श्राप मुझ पर बस यही है एक खामी, अन्यथा सब कुछ है तुम सा एक सा पीते हैं पानी। जाति मानव जाति है धर्म मानव धर्म है एक सा आना व जाना फिर कहाँ पर फर्क है। यह विषमता का जहर अब फेंक दो इन्सान तुम सब बराबर हैं, करो मत भेदगत अपमान तुम। »

पीर का उपहार !!

आपको लगता है क्या मैं चाँद हूँ या चाँदनी रात के झुरमुट में बैठी हूँ मैं कोई अप्सरा गीत हूँ या हृदय की टूटी-फूटी रागिनी… आपको लगता है क्या.. अमरत्व का वरदान हूँ या करुणत्व की उत्श्रृंखला हूँ सरोवर प्रेम का या पीर का उपहार हूँ !! »

यह कैसा अच्छा दिन आया है

इन्सानियत को हमने रुलाया है आज डर ने मुकाम दिल में बनाया है मंदिर से अधिक मधुशालाएं हैं ऐसा बदलाव अपने देश में आया है ये वस्त्रहीन सभ्यता अपने देश की नहीं पर्दा ही आज ,लाज पर से उठाया है बेकारी ,भूंख प्यास ने सबको रुलाया है भारत में यह कैसा अच्छा दिन आया है साहित्य से क्यों दूर हैं आज की पीढ़ियां इस विषय पर क्यों शोध नहीं है कैसा ये सभ्य समाज बन रहा है आधुनिक संगीत अश्लीलता परोस रहा है आज सियासत क्... »

अपने घर और दिल को साफ करें

सुबह सुबह में चलो साफ करें अपने घर और दिल को साफ करें, सोहती फेर लें, पोछा लगा के साफ करें अर्श से फर्श तक न दाग रहें। यदि कहीं लूतिका ने जाल बुन के छोड़ा हो, या चरित्र धूल में सना हुआ हो, देख कर जांच कर के तबियत से अपने घर और दिल को साफ करें। सुबह सुबह में चलो साफ करें अपने घर और दिल को साफ करें, सोहती फेर लें, पोछा लगा के साफ करें अर्श से फर्श तक न दाग रहें। »

हाँ मैंने उसको रोका था..

‘हाँ मैंने उसको रोका था, फिर भी वो चौखट लाँघ गई.. जैसे बस जागने वाले तक, हो इस मुर्गे की बाँग गई.. बाकी सब निष्फल सिद्ध हुआ, हम क्या थे वो कल सिद्ध हुआ.. उस मिथ्या प्रेम की निद्रा में, बस झूठ ही निश्छल सिद्ध हुआ.. इक बेबस बाप ने बेटी को, पहली ही बार तो टोका था.. हाँ मैंने उसको रोका था.. हाँ मैंने उसको रोका था.. क्यूँ आज मेरी समझाइश भी, उसकी निजता का प्रश्न बनी, ये जो स्वच्छंद उड़ाने थी, अब की... »

ताबीर

महज़ ख़्वाब देखने से उसकी ताबीर नहीं होती ज़िन्दगी हादसों की मोहताज़ हुआ करती है .. बहुत कुछ दे कर, एक झटके में छीन लेती है कभी कभी बड़ी बेरहम हुआ करती है … नहीं चलता है किसी का बस इस पर ये सिर्फ अपनी धुन में रहा करती है .. न इतराने देगी तुम्हें ये, अपनी शख्सियत पे बड़े बड़ों को घुटनों पे ला खड़ा करती है …. खुद को सिपहसलार समझ लो ,इसे जीने के खातिर ये हर रोज़ एक नयी जंग का आगाज़ करती है …… अर्चना की रचना “स... »

कविता- ज्ञान दाता |

शिक्षक दिवस की हार्दिक बधाई | कविता- ज्ञान दाता | ज्ञान दाता विज्ञान दाता तुम ही हो | हे गुरु प्रकाश दाता मुक्ति दाता तुम ही हो | जीवन मे अंधेरा बहुत था तुमसे पहले| था घना कोहरा तुम्हारी दृस्टी से पहले | मूल्य कुछ भी न था मेरा संसार मे | खा रही थी हिचकोले नाव मजधार मे | देवता मेरे माता पिता तुम ही हो | उससे पहले माँ मेरी गुरु बन गई | मेरे अवगुण दूर करने की ठन गई| गिरना उठना चलना बोलना सिखा | कौन क... »

सावन की रिमझिम बूंदें

सावन की रिमझिम बूंदों में, भीगे तुम भी, भीगे हम भी भीग गया है तन – मन सारा। नभ से मेघा जल बरसाते, धरती को हैं सरस बनाते गीले हैं आगे के रस्ते। अरे! अरे, आगे फिसलन है, ज़रा संभलकर, हाथ पकड़कर फिसल ना जाए पांव हमारा। पवन तेज़ है, छतरी भी उड़ गई कैसे पहुंचें अभी दूर है, लक्ष्य हमारा। »

भगवान की लीला

हास्य- कविता सत्य – नारायण जी की पूजा थी, शर्मा जी के धाम। गुप्ता जी भी पहुंच गए, छोड़ के सारे काम। आरती के समय सामने, जब थाली आई, डाला दस रुपए का फटा नोट, लोगों से नजर बचाई। भीड़ ज़रा कुछ ज़्यादा थी, अब निकालने को आमादा थी। तभी पीछे से एक आंटी ने, उनका कंधा थपथपाया। और गुप्ता जी को , 2000 का कड़क नोट थमाया। गुप्ता जी ने हाथ जोड़, थाली में नोट चढ़ाया। प्रशाद ले अपना कदम भी, घर की ओर बढ़ाया ।... »

मैं शिक्षक हूं वर्तमान का!

मैं शिक्षक हूं वर्तमान का, मुझे बच्चों से डर लगता है, मजबूर-सा हूं पढ़ाने में, बेरोजगारी से डर लगता है। सम्मान-वम्मान जुति बराबर मगर लाचारी से डर लगता है, अध्यापन ही एक काम नहीं अतिरिक्त कार्य बहुत से होते है, मालिक बड़े ही प्रताड़ित करते, सैलरी रुकने से डर लगता है। क़तरा-क़तरा ख़ून निचोड़े फिर जेब से पैसा निकलता है, ना पढ़ाएं तो खानें के लाले, भूखमारी से डर लगता है। गुरु है , गोविंद समान , कहने क... »

गुरू की महिमा

गुरू की महिमा का मैं, कैसे करूं बखान । गुरू से ही तो किया है, ये सब अर्जित ज्ञान। ऐसा कोई कागज़ नहीं, जिसमे वो शब्द समाएं। ऐसी कोई स्याही नहीं, जिससे सारे गुरू – गुण लिखे जाएं वाणी भी कितना बोलेगी, कितनी कलम चलाऊं। दूर – दूर तक सोचूं जितना भी, गुरू – गुण लिख ना पाऊं। गुरू के गुण असीमित भंडार, गुरू ने ही किया बेड़ा पार मात – पिता इस दुनियां में लाए, गुरू ने यहां के तौर ̵... »

गुरु महिमा

गुरु अर्चना ,गुरु प्रार्थना ,गुरु जीवन का आलंबन है गुरु की महिमा ,गुरु की वाणी जैसे परमात्मा का वंदन है प्रेम का आधार गुरु है ,ज्ञान का विस्तार गुरु है भविष्य का निर्माण वही है ,कर्म का आकाश वही है मैं तो हूँ एक कोरा कागज़ ,मेरा अंतरज्ञान वही है वो उद्धारक ,वो विस्तारक, वक्क की आवाज वही है ज्ञान रूपी गागर भर दे ,सच्चा द्रोणाचार्य वही है अर्जुन और एकलव्य सा जीवन देखे सब में सच्चे गुरु का ज्ञान वही ह... »

जिसे जिंदगी कहते हैं

कितनी उधेड़बुन करती हूं, मैं इन धागों के साथ । जिसे जिंदगी कहते हैं , कभी गम की गांठ खोलती हूं। कभी खुशियों की गांठ बांधती हूं । बस लगी रहती हूं ,इसे सुलझाने में। कितनी उधेड़बुन करती हूं, मैं इन धागों के साथ। जिसे जिंदगी कहते हैं। »

नींद

पलकों पर नींद बिखरी पड़ी होती है , फुर्सत में समेट कर सोते हैं।। »

क्या उकेर देती

क्या उकेर देती , मैं इन कोरे पन्नों के ऊपर। अपने भीतर की वेदना या दूसरों की प्रेरणा । अनकही बातें या सुनी सुनाई बातें। नहीं जानती इसका अर्थ क्या होता । क्या उकेर देती, मैं इन कोरे पन्नों के ऊपर । किसी की हास्य परिहास या कसमों वादों का साथ । मां की मीठी लोरी या बचपन की हमजोली। वही रोज की थकान या फिर अपने अरमान । क्या उकेर देती ,इन कोरे पन्नों के ऊपर । बचपन की खुशहाली या युवा रोजगारी। उकेर देती देश ... »

आगज़नी किसकी है..

‘उलझ पड़ें न कहीं हम, के इस ज़िन्दगी से, अपनी क्या बनेगी, आज तक बनी किसकी है.. इसलिए रखता हूँ हर आतिश को खुद में दफन, कहीं वो पूछ न बैठे कि आगज़नी किसकी है..’ – प्रयाग मायनें : आतिश – चिंगारी »

कैसे बैठे हुए हो यौवन

यूँ रास्तों में कैसे बैठे हुए हो यौवन क्यों बाजुओं में माथा टेके हुए हो यौवन। क्या कोई ऐसा गम है या कोई ऐसी पीड़ा, जिसकी तपिश से इतने मुरझा गए हो यौवन। यह बात सुनी तो उसने उठाई आंखें, पल भर मुझे निहारा देखी सभी दिशाएं। चुपचाप सिर झुकाया आंसू लगा बहाने मैं मौन हो खड़ा था सब कुछ समझ रहा था। कहने लगा सुनो तुम, यौवन बता रहा है निस्सार है ये जीवन हार है ये जीवन। बचपन में आस थी कुछ सपने सजे थे अपने, सम्पू... »

माँ

प्रेम के सागर में अमृत रूपी गागर है माँ मेरे सपनों की सच्ची सौदागर है भूल कर अपनी सारी खुशियां हमको मुस्कुराहट भरा समंदर दे जाती है अगर ईश्वर कहीं है ,उसे देखा कहाँ किसने माँ धरा पर तो तू ही ,ईश्वर का रूप है हमारी आँखों के अंशु ,अपनी आँखों में समा लेती है अपने ओंठों की हंसी हम पर लुटा देती है हमारी ख़ुशी में खुश हो जाती है दुःख में हमारे आंसू बहाती है हम निभाएं न निभाएं अपना फ़र्ज़ निभाती है ऐसे ही न... »

नैन में अब भी घुमड़ते मेघ हैं

कौन कहता है कि बारिश थम गई नैन में अब भी घुमड़ते मेघ हैं, रो रहा आकाश शायद अब नहीं यूँ तड़पती बून्द परिचय दे रही। जिंदगी सुनसान सड़कों सी बनी लालसाएँ ढेर सारी शेष हैं। और कुछ हो या न हो इतना तो है बस इरादे आज भी सब नेक हैं। »

गमगीन है सारा हिन्दुस्तान

गमगीन है हिन्दुस्तान ———————- प्रणवदा थे राजनीति का एक जीता-जागता, सजीव संस्थान निधन,राजनीति ही नहीं, जनता के लिए भी बङा नुकसान । गुणी, पढ़े लिखे, सादगी की थे जो जीती-जागती प्रतिमान इस दौर में ढूँढे नहीं मिलेगा, उनकी बराबरी का कहीं इंसान विरोधियों से भी थी जिनकी अपने सगे-संबंधियों जैसी पहचान करनी कथनी में गज़ब का तालमेल, द्वेष का नहीं नामो-निशान सैद्धांतिक... »

अच्छा लगा

आज धरा से मिला आकाश ,तो अच्छा लगा। नन्हीं – नन्हीं बूंदों से हरी हो गई घास ,तो अच्छा लगा। तल्ख़ हो जाए ,कुछ बातों से जब दिल, कोई दे जाए बातों की मिठास , तो अच्छा लगा। यूं ही तो कोई किसी की परवाह नहीं करता, कोई दिलाए “ख़ास” का एहसास, तो अच्छा लगा । »

तुम्हारी व्यथा

कितनी व्यथा है तुम्हारी जो कम होने का नाम ही नही लेती, आंख मेरी नम कर जाती रोटी से शुरू हुई पलायन तक गई पर मौत पर जा कर रुकी तुम्हारी उदर-ज्वाला संग जंग आंख मेरी नम कर जाती हजारों मील पैदल चले,पांव मे छाले पड़े पर गांव तक पहुँच ना पाऐ तुम्हारी जड़ो को छूने की कसक आंख मेरी नम कर जाती हाथगाड़ी से गृहस्थी को ढ़ोते देखा बैल की जगह जुटते देखा रेल की पटरी पर मरते देखा तुम्हारी मिट्टी में मिलने की कहानी ... »

मां रोती है

नन्हे से बच्चे को जब सड़क पर चाय बेचते देखती हूं इक बहन सिसकती है मां रोती है मेरे अंदर »

कहां चल दिए!

यह कहक़हा लगा कर , मुझे झुकाकर कहां चल दिए। मेरी धूमिल आंखों से ओझल होकर, सच को झूठ बनाकर कहां चल दिए। मैं थी बेकसूर, तुम कसूरवार, ठहरा कर कहां चल दिए। मैं मांगती रही इंसाफ इस दर पर, तुम मुझे ठुकरा कर कहां चल दिए। अब बता दो जश्न जीत की या मेरे हार की, मनाने कहां चल दिए? मैं मिलूंगी कहीं ना कहीं , किसी और सूरत में , फिर से पूछूंगी ये सवाल। मेरी अस्मत पर दाग लगा कर कहां चल दिए? तुम हंस रहे हो मेरी ह... »

नारी तुम पर कविता लिखने को

नारी तुम पर कविता लिखने को वर्णांका असफल है मेरी तुम तो जीवन की जननी हो सब कुछ तो तुम ही हो मेरी। माँ बनकर जन्म दिया मुझको यह सुन्दर सा संसार दिखाया, अच्छी-अच्छी शिक्षा देकर मानव बनने की ओर बढ़ाया। दीदी बनकर स्नेह लुटाया बहन बनी, खुशियों को सजाया दादी बनकर लोरी गाई नैतिक शिक्षा का पाठ पढ़ाया। भार्या का रूप मधुर धर कर जीवन में नईं खुशी लाई, सारा भार स्वयं पर लेकर पीड़ा में भी मुस्काई। बेटी बनकर घर आंग... »

बढ़ता ही जा रहा

क्यूँ बारम्बार किया जाता महिलाओं के साथ घृणित अपराध, कयी तरह की वेदना-संताप से गुजरती,जिनसे होता बलात्कार । हर कानून बौना सावित, हर जायज कोशिश जा रही बेकार, थमता दिखता नहीं, दिन-प्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा दुराचार ।। बेटियाँ परिवार पे बोझ नहीं समझी जाती हैं जब हर सुख-सुविधा, समानता, शिक्षा मुहैया है अब पर विडम्बना है यह, क्या आई है ईश्वर से वह माँगकर कभी बस में, कभी ट्रेन में, कभी स्कुटी से खींचकर लु... »

इस कदर गुज़रेंं हैं..

‘इस कदर गुज़रेंं हैं हम इश्क के दौर से, दिल धड़कता है यहाँ, सदा आती है कहीं और से..’ – प्रयाग मायने : सदा – आवाज़ »

करुण कथा मेहनतकश की

कुछ तो बेबसी रही होगी, जो राहों पर निकल पड़ा मज़दूर। ना साधन है ना रोटी है,, निज घर जाने को मजबूर। कुछ सपने लेकर आया था शहर, वो सपने हो गए चकनाचूर । कड़ी धूप है, ना कोई छाया, कब से इसने कुछ नहीं खाया। भूखा कब तक मरे यहां, घर भी तो है कोसों दूर। फ़िर भी बच्चों को ले निकल पड़ा, बेबस है कितना मज़दूर । किसी ने अपना बालक खोया, किसी का उजड़ा है सिन्दूर। करुण – कथा सुन,मेहनतकश की व्यथा सुन, पलकें भ... »

तिनके का महत्व

तिनके से सिया ने रावण को डराया, तिनके में राम का स्वरूप दिखाया। श्रद्धा हो तो तिनके में भगवान बसते , नहीं तो मूर्तियों में ही पाषाण दिखते। तिनको से पक्षियों का घर बन जाता, तिनका गजानन के मस्तक पर चढ जाता। तिनका डूबते को सहारा दे देता है, तिनका ब्रह्मशीर्षास्त्र का संधान कर देता है। तिनका पतित को पावन बना देता, तिनका सूतक के सारे दोष मिटा देता। तिनके से पितरों का तर्पण होता, तिनका बड़ा ही अनमोल होत... »

गीत मोहब्बतों के भी लिखे जायेंगे।

यूँ ना बाँटो नफ़रतों की पर्चीयां, गीत मोहब्बतों के भी लिखे जायेंगे। सितम चाहे कितने, भी कर लो, फूलों की ज़िद है, खिल ही जायेंगे। इतिहास जब भी, पढ़ा जाएगा, दर्शन आपके हर बार, किये जायेंगे। बीजों को गाड़ दो अतल में कहीं, एक दिन चीरकर पत्थर आ जायेंगे। एक खोजी, अंतर मन से हो जाग्रित, टूटे हुए कलम, फिर उठाए जायेंगे। हम थे ही कब, जो सदा ही रहेंगे, बदलते दौर की कहानी बन जायेंगे। »

वो डरावना-सा बचपन

सब चाहते हैं, फिर से वो बचपन पाना, शरारत से भरी ऑंखें, और मुस्कुराना, पर मैं नही चाहती, वो बचपन पाना, डर लगता है, उस बचपन से, घूरती आँखों, और उन हैवानों से, अब है हिम्मत, हैं डर को जितने का दम, तब नहीं था, वो मेरे भीतर, डरती थी, सहमती थी, बंद कमरे में , सिसकती थी, चाहती थी, खुलकर हंस सकूँ, पर न कुछ कह पाना न समझ पाना, रोना याद कर उन लम्हों को, और खुद को सजा देना, मैं नही चाहती वो बचपन पाना, जहाँ छ... »

कुछ पाया और कुछ खोया

कुछ पाया और कुछ खोया, क्यों मुझे इस बात पर रोना आया! क्यों बिछड़ते रहे अपने, क्यों अजनबियों के बीच मुझे रहना आया! सपनें टूटते बिखरते रहे, उसे समेटते दिल भर आया, कुछ खोया और कुछ पाया। क्या हुआ जो सब टूटा, मेरे भीतर के दर्द को,  कब मैंने समेटा, जो खोया उसे ठुकराया, जानकर भी इस बात पर क्यों, इन आँखों ने सैलाब बहाया। क्यो मुझे सिर्फ खोना ही आया! कुछ पाये थे वो लम्हें, वो बातें। इन सब से दूर अब मुझको जी... »

वो बेख़ौफ दिखाती है, अपनी पहचान

वो बेख़ौफ़ दिखाती है, अपनी पहचान, छिपती ही नहीं परदे के पीछे, रोका है उसे, टोका हैं उसे, छुपाया हैं, उसे, दबाया है उसे, फिर भी छिपती ही नहीं परदे के पीछे, और बेख़ौफ़ दिखाती है, अपनी पहचान, वो जता देती है, वो मदद करती हैं, पराये की भी अपनों की तरह, वो दिल रखती है अपना , सोने-सा होकर। वो जता देती है, उसका न होना क्या है। बिन माँ के बच्चे का होना क्या है, बिन गोद की दुलार का होना क्या है, वो बेख़ौफ़ दिखा द... »

मैं चमकता सा शहर हूं

मैं चमकता-सा शहर हूँ, न रुकता हूँ, न थकता हूँ, मेरा कारवां न रुका है, वो फिर से दौड़ता है, एक रफ़्तार के बाद। हादसे तो मेरे भीतर की आम बातें हैं, मैं खीचता हूँ, सबको अपनी और अनायास, हिला देता हुं किसी की जड़ को, मैं खुद मजबूत खड़ा रहता हूँ। मेरे भीतर के कालेपन को, कोई देख नहीं पाता। मेरी ऐसी चमक ही है यारों, जो हर किसी को, है भाता, मेरे भीतर की हैवानियत, कोई जान नहीं पाता, मैं चमकता-सा शहर हूँ, कैसे क... »

गंगा बहती है जहाँ

गंगा बहती है जहाँ *************** रीषिमुनियो की तपोभूमि बसती हैं वहाँ सबसे पावन भूमि है मेरी गंगा बहती है जहाँ ।। हरदिन से जुड़ी एक कथा, बयां होती है जहाँ हर कथा नैतिकता की पाठ पढाती हैं जहाँ बर, पीपल, शमी, तुलसी की पूजा होती जहाँ हे राम! के नाम से गुन्जित हर सुबहा है जहाँ सबसे पावन भूमि है मेरी गंगा बहती है जहाँ ।। प्रकृतिदृश्य की छटा इतनी निराली है जहाँ पठार, पहाङ, मैदान, मरूभूमि से सजी धरा है ज... »

ये खुद नही मरी है ..

ये दृश्य मैंने ही इन आँखों में उतारा है, ये खुद नही मरी है मैंने इसे मारा है.. ये खुद नही मरी है मैंने इसे मारा है.. दो चार दिन से ही तबियत खराब थी इसकी, पर हिम्मत क्या कहूँ बेहिसाब थी इसकी.. दवा तो दे न सका, मैंने इसे गाली दी, ज़िदगी उम्र भर खुली किताब थी इसकी.. आज थक हार इसने कर लिया किनारा है, ये खुद नही मरी है मैंने इसे मारा है.. मिला जो दुनियाँ से, ना वो खिताब छोड़ सका, न उसे प्यार दिया, ना शरा... »

क्यों बच गई है मैं?

क्यों मैं बच गयी, उन कहरो से, भ्रूण हत्या, कुरीतियों, और अमावताओं से, मिट जाती मिट्टी में, न होती मेरी पहचान, न होती मैं बदनाम, न होती मैं हैवानों से दो चार, न होती यौन शोषण का शिकार, न चढ़ती मैं दहेज़ की बलि, न होती एसिड अटैक का शिकार, न बलात्कारियों की बनती हवस, क्यों बच गयी मैं? क्यों बच गयी मैं? निभाते- निभाते सहते- सहते, थक गयी हूँ मैं, ये ज़िदंगी मिली है मुझे, फिर भी हँस लेती हूँ मैं, फिर लगता ... »

जो सोया है अंधकार में…!!

जो सोया है अन्धकार में जागेगा नवल प्रभात उठ-उठकर देखेगा किरणें सूर्योदय सम होगा ललाट रजत-चाँदनी में स्वप्न को नित पुष्पित कर देखेगा नारी सम्मोहन छोंड़ कवि अब प्रगतिवाद में चमकेगा बहुत हुआ प्रज्ञा! अब जीवन किसलय सम पुष्पित होगा तेरे अन्तस में सुन्दरतम् उच्छवास होगा तेरे मन-मण्डप में दुल्हन सरिस सजेगी कविता पाकर तेरे भाव सौष्ठव बन बैठेगी वनिता || »

अरमान

अरमान जो सो गए थे , वो फिर से जाग उठे हैं जैसे अमावस की रात तो है , पर तारे जगमगा उठे हैं… बहुत चाहा कि इनसे नज़रें फेर लूँ पर उनका क्या करूँ, जो खुद- ब – खुद मेरे दामन में आ सजे हैं …. नामुमकिन तो नहीं पर अपनी किस्मत पे मुझे शुभा सा है, कही ऐसा तो नहीं , किसी और के ख़त मेरे पते पे आने लगे हैं … जी चाहता है फिर ऐतबार करना, पर पहले भी हम अपने हाथ इसी चक्कर में जला चुके हैं…… कदम फूँक – फूँक कर रखूँ त... »

शादी की एलबम

तीन साल का बिट्टू मेरा मुझसे था नाराज़, मैंने पूछा क्या हुआ है, गुमसुम क्यूं हो आज। बोला, मैं आपको अपनी शादी में नहीं बुलाऊंगा, हंसी रोक कर मैंने पूछा, क्या हुआ बताओ ना । मैं सारी एलबम देख के आया, मेरा फोटो कहीं नहीं पाया । आपने मुझे अपनी शादी में नहीं बुलाया, इसीलिए मुझे गुस्सा आया । ओह! इसलिए तुमने मुंह फुलाया, हां, सब आए बस मुझे ही भुलाया । मैं डरने का नाटक कर बोली… अरे, ले के गए थे बेटा,... »

चेतावनी धरती की

हे अज्ञानी मानव,  सुन ले मेरी पुकार, तेरी हूँ मैं पालनहार,  फिर भी तू कड़े है वार l तुमको  शुद्ध आहार दिया,  मुझको प्लास्टिक की पहाड़ दिया, तुझको जीवनदायी पानी दिया, तुमने उसमें जहर मिलाया  l ओजन जैसी प्रहरी दिया, उसको भी कर्म से छेद किया, तुमको खुला आसमान दिया, उसको भी प्रदूषित किया l तुमको मिट्टी की खुशबू दिया,  तुमने कचरे वाली बदबू  फैलाया , जीवन उपयोगी सारी चीजें दिया,तुमने विनाशकारी चीजें बना... »

जन्म भूमि की ओर चलें

जन्म भूमि की ओर चलें ******************* इस बेगाने शहर में मरने से अच्छा अपनी जन्म भूमि की ओर चलें । भूख की जंग में मरने से अच्छा मिट्टी की सोनी खुश्बू के बीच रहें। एक ऐसा सफ़र,जहाँ पैरों का सहारा है जहाँ गाङी नहीं,हौसलों का पंख हमारा है हम प्रवासी,भाग्य से दो-चार होने को चलें—- कितने कष्टों से होते हुए यह सफ़र पूर्ण हुआ दहशत में ना रहो,गाँववासी हूँ वक्त का मारा हुआ कष्ट न होगा ,अपनी जमी को ... »

पूर्णिमा

पूर्णिमा जब चांदनी धरती पर आकर पसारती है लगे चांदी के आभूषण से धरती का रूप सवारती है मां के पास आंगन में सोए नन्हे शिशु पर छांव करें उसे हरी समझ कर पूज गईं पड़ी किरण शिशु के पांव तले जब शीत पवन के झोंके से उन द्खतौ ने अंगड़ाई ली मां कहे कि पवन सताती है फिर चादर से परछाई की यह देख चांदनी रूठ गई मां ने चादर की ओट करी जब कई घड़ी बालक ना दिखा वह फिर बादल में लौट गई »

भोजपुरी बिरह गीत – करी केकेरा प सिंगार बलमु |

भोजपुरी बिरह गीत – करी केकेरा प सिंगार बलमु | कईला काहे हमसे अइसन तू प्यार बलमु | छोड़ी दिहला हमके तू मजधार बलमु | तोहरे बिना लउके हमके सगरो अनहरिया | अंसुवे मे डूबल जाता हमरो उमरिया | कइला काहे हमसे तू नैना चार बलमु | छोड़ी दिहला हमके तू मजधार बलमु | तन औरी मन राजा तोहके सब सउपली| मन के मंदिरवा तोहे देवता नियन पुजली | दगाबाज बनला काहे मोर दिलदार बलमु | छोड़ी दिहला हमके तू मजधार बलमु | गाँव के बगइचवा... »

उम्मीदों का पुलिंदा

उम्मीदों ने ही किया घायल और उम्मीदों पे ही जिंदा था, इस उम्मीद- ए- जहां का मै एक मासूम परिंदा था।। कूट के भरा था दिल में प्यार प्यार का मै बंदा था, सादगी की सादी चादर औढे मासूमियत का मै पुलिंदा था, पर ना था महफूज शायद जमाना मेरी उम्मीदों के लिए, यहां तो ये मासूमियत बस शातिर लोगो को धंधा था।। ना कद्र मेरी उम्मीदों की ना मासूमियत को प्यार मिला, ये सब तो इस जमाने में मानो गरीब का चन्दा था।। तब तक मरत... »

बरसात के आंनद और परेशानियां

सावन की कमी पूरी हो गई, भादों में वर्षा की झड़ी हो गई। बदरा गरज गरज कर बरस रहे , निर्मल झरने कल कल कर बह रहे। बिजली चम चम कर चमक रही, मयूरी छम छम कर नाच रही। ठंडी ठंडी हवा सन सना रही, प्रकृति में चारो और हरियाली छा रही। एक तरफ मन में खुशियां आ रही, दूसरी ओर नदियां तांडव दिखा रही। मंदिर मकान सबकुछ डूब गए, अपनों तक जाने वाले रास्ते टूट गए। भ्रष्टाचारी पुल पहली बारिश सह ना सके, नदियों की धारा संग मिल... »

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