“पैगाम”

आज नहीं तो कल चुका दूँगा ,
कुछ प्यार मुस्तआर ही दे दो,
चोरी छुपे नहीं सरेआम माँगता हूँ ,
आखरी वक्त का सलाम ही दे दो,
सरीक हो जाओ मेरी हयात में रूह बनकर ,
अब तो मेरी साँसों को भी आराम दे दो,
अगर उकूब़त अब भी हैं बाकी तो मेरी,
अजा़ब पर ही जुदाई का इक पैगाम तो दे दो,

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