आंसुओं का क्या है निकलते है फिर
कुछ बह जाते ,कुछ सूख जाते है
लफ्जों के जहर ही तकलीफ दे जाते है
लहूँ में घुल नसों में मुझसे तेज दौड़ जाते है
काश लम्हों की काट-छाँट का कोई हुनर होता
बदबूदार लम्हों के दफ़न का भी कोई हुनर होता
हर सहर लेके आती है साथ नई नई चिंगारियां
और हर शाम ढेर सा धुँआ आँखों में डाल सो जाती है
अपने ही आसपास बस इक खुद को ही ढूंढ़ता है मन
जैसे खुद ही अपने लिए अजनबी सा होके रह गया हूँ
आंसुओं का क्या है निकलते है फिर
कुछ बह जाते ,कुछ सूख जाते है
राजेश ‘अरमान’
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