तुम तो हो फ़ाजिल मनुज
हम कहे जाते पिशुन
हैं गिरे निर्वास गुल,
क्यों उठाकर सूँघते हो।
वह प्रभा जिससे तुम्हें
अनुरक्ति हमसे हो गई,
असलियत वो है नहीं
केवल दिखावा है हमारा,
वास्तविकता में हमारे
अन्तसों में है अंधेरा
बुद्धि के कंगाल हैं हम
खून में पानी भरा है।
रूढ़िवादी सोच के हैं
अक्ल के अंधे रहे हैं,
बस चली आई लकीरों
पर ही चलना जानते हैं।
इसलिए हमने हमेशा
आपसे दूरी रखी है,
दूर से चुपचाप से ही
आपकी चाहत रखी है।
——- डॉ0 सतीश पाण्डेय
कुछ टाइपिंग सुधार के साथ