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उन्हीं से मात खातें हैं

जिन्हें हम दिल में रखते हैं
उसे क्यूँ बता नहीं पाते
हमें स्नेह है कितना
कभी उनसे जता नहीं पाते ।
उम्मीदों के बीज मन में
पाल कर क्यूँ रखते
वजूद नहीं जिनका
उन्हीं से मात हैं खाते।
ख़बर खुद को भी नहीं रहती
मन किधर किस रास्ते पर हैं
भटकने की ख़बर जो हमें होती
ठोकर लगने से पहले ही संभल जाते ।
यह जहाँ हसीन लगती थी कभी हमको
कभी गजलों से अपनी भी पटती थी
पर शब्दों के मोती कहाँ खो से गये हैं
अकेले हम हैं अबतो, रच राग हैं पाते ।

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