ऊंचे-ऊंचे घरों में ,
रहने वाले लोग,
आजकल घरों में ही रहते हैं,
मगर मैं निकला हूं बाहर, साहेब !
रेहड़ी लेकर,
खाली उदर बच्चों का,
टिकने ही नहीं देता है।
ऊंचे-ऊंचे घरों में ,
रहने वाले लोग,
आजकल घरों में ही रहते हैं,
मगर मैं निकला हूं बाहर, साहेब !
रेहड़ी लेकर,
खाली उदर बच्चों का,
टिकने ही नहीं देता है।