ऊंचे-ऊंचे घरों में

ऊंचे-ऊंचे घरों में ,
रहने वाले लोग,
आजकल घरों में ही रहते हैं,
मगर मैं निकला हूं बाहर, साहेब !
रेहड़ी लेकर,
खाली उदर बच्चों का,
टिकने ही नहीं देता है।

Comments

12 responses to “ऊंचे-ऊंचे घरों में”

  1. मोहन सिंह मानुष Avatar

    बहुत सुंदर पंक्तियां
    सच यही है कि पापी पेट के लिए कोरोना दौर में भी गरीब लोगों को काम के लिए इधर उधर जाना ही पड़ता है
    बहुत सुंदर भाव

    1. सुन्दर समीक्षा के लिए हार्दिक धन्यवाद

  2. बहुत ही सुन्दर ।
    एक आम आदमी की बेबसी को प्रकट करती पंक्तियाँ ।
    अपने बच्चों के पेट की भूख के आगे न कोरोना का भय
    अपने कर्तव्यों को पूरा करने निकला है जो होके अभथ

    1. इतनी सुंदर समीक्षा के लिए हार्दिक धन्यवाद सुमन जी🙏

    1. बहुत बहुत आभार सर

  3. Geeta kumari

    गरीबों की व्यथा का यथार्थ चित्रण

    1. धन्यवाद मैडम जी

  4. यथार्थ पर आधारित सुन्दर रचना

  5. अत्यंत ह्रदयस्पर्शी

    1. हार्दिक धन्यवाद सर

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