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“क्यों करता है मन को कलुषित”

क्यों करता है मन को कलुषित
भरकर ह्रदय में विष का सागर
प्रेमबीज बो कर ही,
उगता है एक वृक्ष धरा पर ।
वृक्ष धरा पर उगकर देता सुंदर फल है,
उसे सींचता सदा ही अविरल निर्मल जल है।।

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