क्यों करता है मन को कलुषित
भरकर ह्रदय में विष का सागर
प्रेमबीज बो कर ही,
उगता है एक वृक्ष धरा पर ।
वृक्ष धरा पर उगकर देता सुंदर फल है,
उसे सींचता सदा ही अविरल निर्मल जल है।।
“क्यों करता है मन को कलुषित”
Comments
3 responses to ““क्यों करता है मन को कलुषित””
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बहुत ख़ूब
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आपकी सराहना के लिए
मेरे पास शब्द नही हैं
कवि हो तो आप जैसा
वाह प्रज्ञा जी !
क्या शब्द सागर है आपका,
सुंदर शिल्प तथा हृदय तक
जाते भाव.
एक अच्छी कविता के सभी गुण हैं
पाठक के मन को छूने वाले भाव… -

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