गर निकल पड़े जो सफर को

गर निकल पड़े जो सफर को
देख मुड़ के न फिर डगर को

आएँगे यूँ तो कई विघ्न
पड़ेंगे देखने कई दुर्दिन
हौसला हो साथ अगर
हो जायेंगे ये छिन-भिन्न

तट से जो भटक गई हो,
तो दो मोड़ उस लहर को

गर निकल पड़े ———

गर काली रात हो सामने
बढ़ाओ हाथ अंधेरों को धामने
देंगे फिर घुटने टेक
दो पल के ये है पाहुने

गर डस ले सर्प कालरूपी
उगल डालो उस जहर को

गर निकल पड़े ——–

गर फस जाएँ तूफा में कस्ती
लगने लगे मौत जीवन से सस्ती
अगर ठान लो जूझने की ,
फिर इस तूफा की क्या है हस्ती

पा लोगे अपने किनारे
कर परास्त इस भवर को

गर निकल पड़े ——

क्यों हो ढूँढ़ते उत्तम अवसर
होता आया है यही अक्सर
जिसने किया इंतज़ार इसका
प्रयास उसका वहीँ गया ठहर

गर हो प्रतिकूल समय तो
बदल डालो उस पहर को

गर निकल पड़े जो सफर को
देख मुड़ के न फिर डगर को

राजेश’अरमान’
२७/०७/१९९०

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