जाने क्यूँ वो छोड़ के मेरा साथ गया
तन्हाइयों के पुर्ज़े दे के मेरे हाथ गया
हमें तो सुकूँ था वक़्त के सूखों में भी
बेवज़ह दे के आँखों को वो बरसात गया
सब कुछ हार के बैठे थे उसके पहलू में ,
फिर वो क्यूँ दे के मुझे मात गया
चंद चुप लफ़्ज़ों का बस सिकंदर था
बेज़ुबाँ कर के वो मेरे हालात गया
तुम क्या जानो वफ़ा, क्या है ‘अरमान’
जब मिला, दे के यही सौगात गया
राजेश ‘अरमान’
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