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जीवन:- अभिशाप है या वरदान !!

यह जीवन है वरदान कभी
यह जीवन है अभिशाप कभी…

मिलते हैं सच्चे मित्र यहाँ
तो बन जाते हैं शत्रु कभी…

प्रज्ञा’ का जीवन बेमोल रहा
तो बन बैठा उपहार कभी…

बस रह जाता है प्रेम यहाँ
सब खो जाता है यार यहीं…

हे जड़बुद्धी ! मानव तू सुन
है प्रेम का कोई मोल नहीं…

कल जाने क्या हो यहाँ यार !
तू धो दे मन के दाग अभीसभी…

By Pragya Shukla’ Sitapur

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