यूँ तो रिश्ते
रोज़ ही बनते हैं
इस जहां में
कुछ टूट जाते हैं
कुछ बिक भी जाते हैं
लेकर बहाने तरह–तरह के
लेकिन
टिकते हैं रिश्ते
वो ही
जिन रिश्तों में
दोनो पक्षों ने
वफा के अलावा
और कोई माँग
कभी की ही नहीं।
– कुमार बन्टी
यूँ तो रिश्ते
रोज़ ही बनते हैं
इस जहां में
कुछ टूट जाते हैं
कुछ बिक भी जाते हैं
लेकर बहाने तरह–तरह के
लेकिन
टिकते हैं रिश्ते
वो ही
जिन रिश्तों में
दोनो पक्षों ने
वफा के अलावा
और कोई माँग
कभी की ही नहीं।
– कुमार बन्टी