Tag: realism

  • अपने ही सूरज की रोशनी में

    अपने ही सूरज की रोशनी में

    मोतीसा चमकता

    औस का कतरा है आज़ वो

    जो कल तक था

    अंधेरे में जी रहा।

     

    कितनो की आँखों का

    तारा है आज़ वो

    जो कल तक था

    अज़नबी बनकर जी रहा।

     

    दूसरो के कितने ही

    कटे जख्मों को  है वो सी रहा

    लेकिन अपने ग़मों को

    अभी भी

    वो खुद ही है पी रहा।

     

     

    कितनी ही बार जमाने ने

    उसे गिराया लेकिन

    वो फिरफिर उठकर

    जमाने को ही

    सँवारने की तैयारी में

    है जी रहा।

     

    अपने दीया होने का

    उसने कभी घमण्ड नहीं किया

    तभी तो आज़ वो

    सूरज सी चमक लेकर

    है जी रहा।

     

     

    जीवन कि दिशा पाकर

    आज़ वो दुनियाँ को है जीत रहा

    जो कल तक था

    खुद से ही

    हारा हुआ सा जी रहा।

     

    अपनी मौत का भी

    डर नहीं अब उसको

    क्योंकि उसे मालूम हो गया

    कि गडकर इन पन्नों पर

    वो सदियों तक होगा जी रहा।

     

                                                  –   कुमार बन्टी

     

     

  • ख़ुशी क्या है ?

    क्या सिर्फ

    चेहरे पर बनी कुछ लकीरें

    तय करती हैं ख़ुशी ?

    या फिर

    किसीके पूछने पर

    ये कह देना

    “मैँ खु़श हूँ”

    इससे ख़ुशी का पता लग सकता है ?

      — KUMAR BUNTY

  • क्या लिखूँ ?

    दिनरात लिखूँ

    हर बात लिखूँ

    दिल के राज़ लिखूँ

    मन के साज़ लिखूँ।

     

    अपने वो दिन बेनाम लिखूँ

    लेकिन नहीं हुआ बदनाम लिखूँ

    कितना बनकर रहा गुमनाम लिखूँ

    इतना कुछ पाने पर भी

    बनकर रहा मैं प्राणी आम लिखूँ।

     

    मन तो मेरा कहता है

    कि लगातार लिखूँ

    और दिल भी पुकारता है

    कि सबके सामने सरेआअम लिखूँ।

     

     

     

    कितनों ने दिया साथ

    और कितनों ने

    दिखाया खाली हाथ

    क्या वो भी लिखूँ।

     

    वक़्त केसे पड़ गया कम

    होते हुए भी मन में

    समुद्रसी अनगिनत,

    लेकिन हर धार नज़ारेदार

    ये गुत्थी भी है मज़ेदार

    दिल तो कहता है

    ये भी लिखूँ।

     

    कहां से लेकर कहां तक लिखूँ

    जब मुझे आदि और अंत का

    ज्ञान ही नहीं

    किसकिस ज़माने की गाथाऐं लिखूँ

    जब मुझे अबतक सही और गलत की

    पहचान ही नहीं

     

    और हां

    तुम जो कोई भी हो

    जो ये पढ़ रहे हो

    उसके खातिर

    उसे बिना जाने ही

    आखिरखार क्या लिखूँ?

     

                                           कुमार बन्टी

     

                             

     

  • तू ही बता दे जिंदगी

    कुछ खो गया है मेरा

    या फिर

    मैं खुद ही लुटा रहा हूँ

    जिंदगी कहीं

    चल तू ही बता दे जिंदगी

    आज़ नहीं तो

    कल किसी और मोड़ पे सही

    मुझे कोई जल्दी नहीं

    लेकिन तुम

    इतनी भी देर मत करना

    कि खो चुका हूँ मैं

    खुद को ही कहीं।

                                                                                                                                                                                            कुमार बन्टी

     

  • SHAYARI

     

    तुझसे  मिलने का  मुझे कोई  आसार भी नहीं दिखता।

    लेकिन इंतज़ार तेरा करतेकरते मैं फिर भी नहीं थकता।

  • SHAYARI

    साथ देने में मेरा

    जिंदगी के दुखों का

    कोई सानी नहीं

    असल में तो

    दुख के बिना

    सुख का भी

    कोई मानी नहीं।

                                                                              मानी= अर्थ

  • SHAYARI

    SHAYARI

    तंग नहीं करता हूँ मैँ उसे आज़कल

    ये बात भी तो  उसे  तंग करती है

  • SHAYARI

    अंत तो तेरा भी वही होगा अंत मेरा भी वही होगा

    लेकिन फर्क इस बात से पड़ेगा

    कि किसकी जगह लेने वाला कोई नहीं होगा।

  • SHAYARI

     

    साथी तो मेरे वो भी खूब रहे

    जो लगातार मेरी तनकीद करते रहे

    लेकिन अमलअंगेज़ तो मेरे वो बखूबी रहे

    जो लगातार मुझसे कोई उम्मीद करते रहे।

    तनकीद=आलोचना

    अमलअंगेज़ = उत्प्रेरक

     

  • SHAYARI

     

    जिंदगी की जंग  मुझसे जारी है

    कभी मैं उसपे

    तो कभी वो मुझपे भारी है।

  • SHAYRI

     

    ज्ञानी को होता है एकांत पसंद

    लेकिन किसीसे मिलने की तलब

    मूर्खता का प्रमाण तो नहीं होता

    कम से कम प्यार में तो नहीं होता।

  • SHAYRI

    क्या नाम है उसका

    कौन से देश से है वो

    असल मे दिल देने वाला तो

    सोचता ही नहीं इन सब बातों को।

  • SHAYARI

    है मुझे एक मर्ज़

    लेकिन मुझे खौफ नहीं

    क्योंकि है वो मर्ज़

    बेखौफी का ही।

  • SHAYARI

    SHAYARI

    प्रेम के बारे में क्या बात करूँ

    प्रेम की अभिव्यक्ति शब्दों मे कहां होती है

    मिले सबको प्रेम वो अलग बात है

    लेकिन प्रेम की चाह तो हरेक दिल में होती है।

  • कोई क्या करे तब….

    वक़्ता भी क्या बोले

    जब कोई उसे

    ध्यान से

    सुनने को तैयार नहीं।

     

    लेखक भी क्यों लिखे

    जब कोई कुछ

    दिल से

    पढ़ने को तैयार नहीं।

     

    गायक भी कैसे गाए

    जब कोई

    सुरों की

    कदर करने को तैयार नहीं।

     

    आशिक़ भी अपने दिल को

    क्यों खोले

    जब उसका प्यार उसे

    समझने को तैयार नहीं।

     

    दर्द में भी कोई

    क्यों चींखे

    जब कोई उसकी

    चींख सुनने को तैयार नहीं।

     

    गम में भी कोई

    कैसे रोए

    किसीके आगे

    जब कोई उसका गम

    समझने को ही तैयार नहीं।

     

     

    कोई कैसे जीए

    जब जीने का कोई

    सहारा ही नहीं

    और तो और

    उससे मिलना भी

    किसीको गवारा नहीं।

     

    इंसान किसे ढूँढे

    जब उसे

    खुद की ही

    मालूमात नहीं।

     

                                      कुमार बन्टी

  • सीखता रहता हूँ मैं

    जाने

    क्याक्या चीजें

    लिखता रहता हूँ मैं

    वक़्त की इस महँगाई में

    खुद के ही हाथों

    खुद को

    बिकता रहता हूँ मैं

    सब से दूर होकर

    पता नहीं

    किसके करीब

    खुद को

    खींचता रहता हूँ मैं

    कईं बार तो

    इसी वज़ह से

    खुद पे ही

    झींकता रहता हूँ मैं

    लेकिन आखिर में

    चाहे हार जाऊँ

    या जीत जाऊँ

    फिर भी

    कुछ कुछ

    सीखता रहता हूँ मैं।

     

                                                                          –        कुमार बन्टी

     

     

  • अधूरापन ये मेरा

    अधूरापन ये मेरा

    क्या पता

    मेरे भीतर

    कोई आग जला दे

    और फिर कभी

    मेरे भीतर कोई

     कामयाब सूरज़ उगा दे।

     

                                        कुमार बन्टी

     

  • कौन मिलेगा कहां

    कौन जानता है

    कि कौन मिलेगा कहां

    देखौं

    मैं तो हूँ यहां

    और तुम हो

    जाने कहां

    लेकिन तुम

    मिल रहे हो मुझसे

    पढ़कर मेरी लिखी जुबां।

     

                                   कुमार बन्टी

     

  • काबिल सदा

    बातें दिल की बयां करना
    आसां नहीं इतना
    लेकिन
    अपनी सदा को
    इतना काबिल तो
    जरूरी है बनाना
    कि डर से भी कभी
    न पड़े डरना।

                                                                                                                                                      सदा= आवाज़
    – कुमार बन्टी

  • कोशिश की राह

    कोशिश की राह

    नहीं हारनी है हिम्मत

    जब तक ये साँस हैं

    क्योंकि मुझे

    उम्मीद की चाह से ज्यादा

    कोशिश की राह पे विश्वाश है।

     

                                          –   कुमार बन्टी

  • दिन और रात का सपना

    दिन में देखा सपना

    रात को देखा सपना

    रात का जब टूटा सपना

    दिन में जगा हुआ पाया

    लेकिन दिन का जब टूटा सपना

    रात में भी सो पाया।

     

     

                                    कुमार बन्टी

     

  • धागे-मोती

    मोती को धागे से

    और धागे को मोती से

    जब तक होता नहीं प्यार

    तब तक

    उनकी नहीं बनती

    कोई विशिष्ट पहचान।

     

     मोती=शब्द

     धागे=विचार

                                      कुमार बन्टी

     

  • दिन और रात का सपना

    दिन में देखा सपना

    रात को देखा सपना

    रात का जब टूटा सपना

    दिन में जगा हुआ पाया

    लेकिन रात का जब टूटा सपना

    दिन में भी सो पाया।

     

     

                                              कुमार बन्टी

     

  • टिकते वाले रिश्ते

    यूँ तो रिश्ते

    रोज़ ही बनते हैं

    इस जहां में

    कुछ टूट जाते हैं

    कुछ बिक भी जाते हैं

    लेकर बहाने तरहतरह के

    लेकिन

    टिकते हैं रिश्ते

    वो ही

    जिन रिश्तों में

    दोनो पक्षों ने

    वफा के अलावा

    और कोई माँग

    कभी की ही नहीं।

                                                            कुमार बन्टी

  • जिसको जरूरत होती है….

    जिसको जरूरत होती है

    वही साथ चलता है

    बिन जरूरत वाला तो बस

    तनक़ीद करने को ही मिलता है।

     

    अपना मतलब सोचे

    दूसरे की मदद करते वक़्त

    आज़ इस दुनियाँ में

    ऐसा इंसान कम मिलता है।

     

    जो दूर से दिखाती हैं निगाहें

    पास जाकर छानने पर

    वही मंजर

    हर बार कब मिलता है।

     

    बड़ीबड़ी नावें

    पैदा करती है

    दरिया में बहुत भारी हलकम

    लेकिन अगर

    डूब जाएँ वें कभी

    तो उनका नामोनिशान कहां मिलता है।

     

    खुदखुद

    पा लेता है

    वो अध्द्भुत औषधि

    जो अपने घावों से पहले

    दूसरो का जख्म

    बखूबी सिलता है।

     

    और

    तब क्या गम होगा

    किसीके हिज्र का       

    जब बंदा उसके करीब हो

    जिसकी मर्जी बगैर

    एक पता भी नहीं हिलता है।

                                                               

                                        कुमार बन्टी

    जिसको जरूरत होती है….

     

    जिसको जरूरत होती है

    वही साथ चलता है

    बिन जरूरत वाला तो बस

    तनक़ीद करने को ही मिलता है।

     

    अपना मतलब सोचे

    दूसरे की मदद करते वक़्त

    आज़ इस दुनियाँ में

    ऐसा इंसान कम मिलता है।

     

    जो दूर से दिखाती हैं निगाहें

    पास जाकर छानने पर

    वही मंजर

    हर बार कब मिलता है।

     

    बड़ीबड़ी नावें

    पैदा करती है

    दरिया में बहुत भारी हलकम

    लेकिन अगर

    डूब जाएँ वें कभी

    तो उनका नामोनिशान कहां मिलता है।

     

    खुदखुद

    पा लेता है

    वो अध्द्भुत औषधि

    जो अपने घावों से पहले

    दूसरो का जख्म

    बखूबी सिलता है।

     

    और

    तब क्या गम होगा

    किसीके हिज्र का       

    जब बंदा उसके करीब हो

    जिसकी मर्जी बगैर

    एक पता भी नहीं हिलता है।

                                                               

                                        कुमार बन्टी

  • खुद को खोने के डर में

    खुद को खोने के डर में

    भीड़ भरी इस तन्हाई में

    जीना

    एक अलग नज़रिए के साथ

    कितना

    जरुरी बन गया

    दिनदिन

    बदलता

    यहां हर मुकाम

    मुझे

    ये जाहिर कर गया।

     

    शोर भरे सन्नाटे में

    कैसे

    मैं ढ़ल गाया

    ये तो

    बस मैं ही जानता हूँ

    लेकिन

    खुद को खोने के डर में

    इस

    भीड़ भरी तन्हाई में

    जब से मैं

    खुद से मिल गया

    तब से मैं

    खुद को

    बड़ा खुशनसीब मानता हूँ।

     

                                                           –   कुमार बन्टी

     

  • खुली किताब नहीं

    खुली किताब नहीं

    एक ही झटके में

    सबकुछ समझ जाओ तुम

    मेरा जीवन

    ऐसी कोई

    खुली किताब नहीं

    राह हासिल करने को

    गंदी नाली को स्वीकारले

    ऐसा ये कोई

    बेवकूफ आब नहीं।

     

                                                                         -कुमार बन्टी

  • अकेले होने का मतलब

    अकेले होने का मतलब हर बार

    बस उदास होना ही  नहीं होता

    हो सकता था  मैं  भी  बरबाद

    पास अगर मैं  खुद के होता।

     

    किसीकी कोई चोट

    ऐसी भी होती है

    जिसका एक निशाँ ही

    कईं चोटो से कम नहीं होता।

     

    कुछ गम

    सीख देने वाले भी होते हैं

    सिर्फ रूलाने खातिर ही

    हर गम नहीं होता।

     

    गम किसीके जाने का

    कईं बार इतना गहरा होता है

    कि वो

    आँसुओं के ख़त्म होने पर भी

    कम नहीं होता।

     

    लेकिन जिसने

    परमप्रकाश पा लिया हो

    उसके लिए किसी भी मुकाम पे

    तम नहीं होता।

     

    और वो तो इंसान कईं बार

    यूँ ही भ्रम पाले फिरता है

    वरना यहां कोई भी इंसान

    किसी से कम नहीं होता।

     

                                                                               –   कुमार बन्टी

     

  • कुछ पल

    कुछ पल

    कुछ पल

    बन जाते हैं

    सब कुछ।

     

    कुछ पल

    कह देते हैं

    खुद ही कुछ।

     

    कुछ पल

    छोड़ते नहीं

    संग में कुछ।

     

    कुछ पल

    जिनका मिलता नहीं

    किसीकी को भी

    कोई भी हल।

     

    कुछ पल

    यूँ ही

    जाते हैं ढ़ल।

     

    कुछ पल

    टिकते नहीं

    कुछ भी पल।

     

    कुछ पल

    रहते वहीं सदा

    आज़ और कल।

     

    कुछ पल

    खो जाते हैं कहीं

    हो जाते हैं गुम

    बनकर सबसे हसीं पल।

     

    कुछ पल

    रूलाते हैं बहुत

    जब याद जाएँ

    किसी पल।

     

    कुछ पल

    देते हैं सकून

    अगर मिल जाएँ

    कुछ ही पल।

     

    कुछ पल

    जो सस्ते हैं आज़

    क्या पता

    महँगे हो जाए कल।

     

     

     

    कुछ पल

    कर देते हैं

    जीना मुश्किल।

     

    कुछ पल

    होते हैं

    हर समस्या का हल।

     

    कुछ पल होते हैं

    जीवन के हालात

    सँवारने के लिए

    डरना नहीं

    क्योंकि ये हो सकते हैं

    तुम्हे तपाने के रास्ते

    साथ लिये हुए

    चलते हैं तुम पर

    व्यंग्य कसते हुए।

     

    कुछ पल होते हैं

    जीवन में निखार लाने के लिए

    लगते हैं वो पल

    कईं बार

    तुम्हे ही कैद करते हुए।

     

    कुछ पल

    कईं बार

    देते हैं

    बहुत कुछ बदल।

     

    कुछ पल

    बस मिलते हैं

    कुछ ही पल

    नहीं उम्रभर

    उन्हें वापिस लाने के लिए

     कोई

    कर भी नहीं सकता कुछ।

     

    कुछ पल

    समझे जा सकते हैं

    बस उन्हें

    जीकर ही

    कुछ पल।

                                                                                                             कुमार बन्टी

     

  • सफाई-अभियान

    कितनी ही बार

    हमारे college में

    NSS के तहत

    Cleanliness drive का

    प्रोग्राम चलाया गया

    और हाँ

    कुछ दिनों पहले ही

    हमारे PM

    मोदी जी ने भी

    स्वच्छता को लेकर

    देश भर में

    सफाईअभियान चलाया

    College में NSS Volunteers ने

    खूब होहल्ला मचाया

    और देश भर में भी

    जगहजगह पर

    लोगों ने खूब जोर लगाया…..,

     

    और क्या खूब नज़ारा

    साफसफाई का

    मेंने यहां और वहां का पाया….,

     

    यहां तो

    सफाई का करतब

    केवल NSS की

    Cleanliness drive तक ही

    सीमित रह गया

    और वहां का मंज़र

    न्यूज़ चैनलों

    और अखबारों की

    सुर्ख़ियाँ बनकर

    काफी वाहवाह पा गया,

    काफी दिनों की

    चर्चाओं में भी गया

    लेकिन जैसे ही

    पुरानी हुई

    TV-अखबारों कि खबरें

    वैसे ही

    ये नितांत आवश्यक

    सफाईअभियान भी

    पुराना होता चला गया….,

     

     

    काफी कचरा साफ भी हुआ

    लेकिन

    दिखावेपन के नखरे में ही

    ज्यादा काम हुआ

    आसपास को

    साफ सुथरा रखने के लहजे में

    ज्यादा कुछ हुआ….,

     

    इस अभियान का

    पूरा असर

    होने में,

    मेंने दूसरों को तो

    कसूरवार ठहराया

    लेकिन फिर

    मामला गौर से परखने पर

    मेंने खुद को भी

    कहीं कहीं

    इसमें दोषी पाया

    और फिर

    समझकर अर्थ और जरूरत

    साफसफाई की

    एक कदम मेंने भी

    इस अभियान में

    सच में बढ़ाया….,

     

    वातावरण को रखकर साफस्वच्छ

    रहोगे तुम हमेशा स्वस्थ

    ये मेरा दावा है

    और ये सफाईअभियान

    कोई दिखावा नहीं

    क्योंकि साफसुथरा वातावरण तो

    हमारे स्वस्थ जीवन खातिर

    हमारा स्वच्छ पहनावा है

                           

                                                                                           कुमार बन्टी

  • कानून के कुछ रखवाले

    कानून के कुछ रखवाले

    खूब ख्याल रखते हैं

    कानून का

    खूब रक्षा करते हैं

    कानून की

    खास नज़र रखते हैं

    इस बात की

    कि कहीं ये कानून

    “न्याय” का साथ तो नहीं दे रहा

    इस तरह का कोई

    घोर “अन्याय” तो नहीं हो रहा

     

     दरअसल “न्याय” के मायने

    उनके लिये

    कुछ अलग ही होते हैं

    एक अलग ही

    “न्याय की किताब”

    वें अपने तकिये तले

    रखकर सोतें हैं

     

    ये रखवाले

    इतने मेहनती होते हैं

    कि सिपाही बनने खातिर

    कुछ भी करने को

    तैयार रहते हैं

    यहां तक कि

    “रिश्वत देने को भी”

    इनके हिसाब से

    खुद का उद्धार करना ही

    “न्याय” है

    जिसके लिए ये

    तैयार रहते हैं

    “रिश्वत लेने को भी”

     

    अपने परिवार के प्रति

    इतने जिम्मेदार होते हैं

    कि उनके पालन-पोषण के लिए

    गरीबों को भी

    तबाह करने को तैयार रहते हैं

    क्योंकि उसके बदले इनको

    अमीरों से

    मोटे पैसे जो मिल रहे होते हैं

     

     “असल न्याय” के खातिर

    न कोई अपील

    न दलील

    और वकील तो इनमें से

    कुछ खुद ही होते हैं

                                                                कुमार बन्टी

  • किस खतरनाक मंज़िल की तरफ

    किसीकी मज़बूरी का उपयोग

    क्या खूब

    ये ज़माना कर रहा है

    किस खतरनाक

    मंज़िल की तरफ

    इंसान अब बढ़ रहा है।

     

    संतुष्टि का मतलब

    स्वार्थ तक ही

    सीमित रह गया

    लगन वाला हुनर

    अब तो बस

    नौकरी पाने का

    लालच बनकर रह गया।

     

    मज़बूरी में ही हो रही हैं

    कईयों की डिग्रियां

    कईं जगह तो

    हो भी रही है

    इन डिग्रियों की बिक्रीयाँ।

     

    मानसम्मान का मतलब भी

    अब केवल

    दबदबा कायम करने तक ही

    सीमित रह गया

    औरो की क्या कहूँ

    मैं खुद भी जाने

    जमाने की

    कितनी आँधियों में बह गया

    लेकिन फिर भी मैं

    कम से कम ये सच तो कह गया।

     

                                                        –   कुमार बन्टी

     

  • SHAYRI

    बड़े से बड़े मुकाम में भी  कोई बल नहीं।

    अगर जिंदगी में सकून का कोई पल नहीं।

  • SHAYRI

    जग में सारा का सारा ज्ञान लिखा हुआ कहां मिलता है।

    ज्यादातर  ज्ञान तो  विचारों  में ही  छिपा हुआ मिलता है।

  • रब  तो  वाकई  सबके  दिलों  में……..

    रब  तो  वाकई   सबके  दिलों   में  बसता  सम  है।

    लेकिन  उसे  पहचानने  वाला  इंसान  बड़ा कम है।

     

    तुम  मेरे  चेहरे  की   इस  मुस्कान  पे   मत  जाओ

    इसके  पीछे  छिपा   जाने  कितना  बड़ा  गम  है।

     

    चाहे  अपना   चाहे   पराया   मतलब  अगर     हो

    तो   किसीके   मरने  का  भी   किसे   यहां  गम  है।

     

    आधुनिक तरक्की को तरक्की कहना मुनासिफ नहीं

    अरे इस रोशनी की आड़ में छिपा बड़ा गहरा तम है।

     

    ये  तलब  तब  बन  जाती  है   परेशानी  का  सबब

    जब  जितना भी  लिख दूँ  लेकिन  लगे  ज़रा कम है।

     

    समझने  की   बात  अगर  तुम   सच  में  समझ  गए

    तो   फिर  कहोगे  कि  बंदे में  वाकई  बड़ा  दम है।

                                                                            कुमार बन्टी

  • वक़्त की हवा

    वक़्त की हवा

    काश दुनियाँ में ऐसी भी कोई गलती हो

    जिसे करने पर भी जिंदगी बेफिक्र चलती हो।

     

    ऐसा जहां बनाने की कोशिश में हूँ

    जहाँ इंसानियत सिर्फ रब से डरती हो।

     

    अरे वक़्त की उस मार से क्या डरना

    जो गलतफहमी को दूर करती हो।

     

    ऐसी दौलत का मुझे क्या करना

    जो मुझे खुद से ही दूर करती हो।

     

    प्रेम की परिभाषा किसी घड़े का पानी नहीं

    दुनियाँ भले ही ऐसा समझती हो।

     

    वें स्कूल कैसे जाएंगे जिन्हें

    पेटभर रोटी भी कभीकभार मिलती हो।

     

    और उन्हें पढ़नेलिखने की क्या जरूरत

    जिनकी हर बार सिफारिश से सरती हो।

     

    वो पाश्ताप से भी कैसे सुधरेगी

    जो जानबूझकर की गई गलती हो।

     

    वक़्त की हवा बदलती जरूर है

    चाहे कितनी भी मज़बूति से चलती हो।

     

                                                             –        कुमार बन्टी

     

  • मेरे घर में भी मुझे  पहचानने वाला ………..

    मेरे घर में भी मुझे  पहचानने वाला ………..

    मेरे घर में भी मुझे  पहचानने वाला बस एक शक्स हमेशा रहता है।

    जब मैं देखूं उसे  वो भी  आईने से  मुझे  बस देखता रहता है।

     

    यहां इस खु़शहाली में अमीरों को नींद बस ठंडी हवा में आती है

    लेकिन गरीब यहां का  जीवनभर  अपना तन  सेंकता रहता है।

     

    किसीको तो  प्यारा  है  अपना  इमान  अपनी जान  से  भी  ज्यादा

    और  कोई  तो  यहां  बस  चंद पैसों खातिर  इसे  बेचता  रहता है।

     

    अपने ज़ज़्बे के  ज़ोर से  कर  देता  है  कोई  तो  हर  मुसीबत  को  धवस्त

    लेकिन  कोई तो  यहां  मुसीबत को  बस देखते ही  घुटने  टेकता  रहता है।

     

    कोई पैसा कोई बुद्धि तो कोई  प्रेम  को हर मर्ज़ की दवा मानता है

    लेकिन बंदातो सबसे जरूरीबेहतरीन चीज़ को  बस नेकता कहता है।

     

                                                                                                  कुमार बन्टी

     

  • CRY FOR SMILE

    God makes us cry

    So that we can realize

    The value of smile..,

  • SHAYRI

    है मुझे एक मर्ज़

    लेकिन मुझे खौफ नहीं

    क्योंकि है वो मर्ज़

    बेखौफी का ही।

  • मंजिल का नज़ारा तो…………..

    मंजिल का नज़ारा तो…………..

     मंजिल का नज़ारा तो अपनी पालकों तले कम ही बीता है।

    हमारा ज्यादा वक़्त तो बस  सफर के बहाने ही  बीता है।

     

    किसीके  दिल  में  किसीके  खातिर  प्यार  है  कितना

    इस  उंचाई  को  नापने  खातिर  कहां  कोई  फीता है।

     

    वक़्त  की  रफ्तार  को  कोई  लगातार  चुनौती दे सके

    क्या  इस  दुनियाँ  में  कहीं  ऐसा भी  कोई  चीता है।

     

    वो पुराने दिन  पुरानी बातें सिर्फ इतिहास में ही रह गई

    इस  जमाने  में  तुम्हारे  खातिर  कहां  कोई सीता है।

     

    लेकिन  उनकी वफा पे उंगली उठाना भी  मुनासिफ नहीं

    ये मर्द भी तो  जानबूझकर  घाटघाट का पानी पीता है।

     

    अपने लिए भी जीने का वक़्त  कम मिलता है आज़कल

    तुम पूछते हो कि  यहां कौन  किसके  खातिर जीता है।

     

    हारजीत के दौर में  असल जीत सिर्फ तब हासिल हुई

    जबजब इस बंदे ने  पहले  खुद को  बखूबी जीता है।

     

                                                                           कुमार बन्टी

     

  • SHAYRI

    उतारचढ़ाव तो  इस जिंदगी में  हमेशा चलतें ही रहेंगें।

    दुश्वार पल तो क्या मुकम्मल मुकाम भी सदा नहीं रहेंगें।

  • अज़ीब संपनता

     क्या अज़ीब संपनता है

    इस देश की

    क्या खूब साधनता है

    यहां की

    किसी के यहां तो

    रोज़ कोई

    नया पकवान बनता है

    और कहीं तो

    रोज़ कोई

    भूखा ही मरता है

    ये असमानता भी

    क्या खूब बन पड़ी है

    जो अलगअलग जगहों पर भी

    समान रूप से खड़ी है।

     

    हम खेतों में

    इतना उत्पाद उगाने का

    दावा करते हैं

    कि विदेशों में भी

    उसे भेजने का

    वादा करते है

    लेकिन मिटा पा रहे

    हम अपने ही देश के

    कितने ही गरीबों के

     भूखे पेट की भूख

    क्या इस बात पर

    हम कभी

    ध्यान भी कर रहे हैं।

     

    गरीबों की गरीबी

    मेज़बूरो की मज़बूरी

    मासूमो की मासूमियत

    और जरूरतमंदो की जरूरत

    आज़ सिर्फ

    इतनी ही बनकर रह गई है

    कि पत्रकारों को

    खबर मिल जाए

    छापने के लिए

    चैनलों को मुद्दा मिल जाए

    बहस करने के लिए

    और हमारे आदरणीय नेताओं को

    मौका मिल जाए

    भाषण देने के लिए

    या फिर सोशल मीडिया को

    कोई नया वीडियो मिल जाए

    इंटरनेट पर डालने के लिए।

     

      समस्याएँ तो बहुत पुरानी हैं

    लेकिन साथ में

    एक और समस्या पुरानी है

    कि कितनों ने ही

    कितने ही तरीकों से दिखाई है

    और कितनी ही बार समझाई है

    लेकिन लगता नहीं

    कि किसी कर्ताधर्ता के

    समझ में आई है

    ही लगता है

    कि किसीके समझ में आनी है

    क्योंकि

    जो बैठे हैं उंचे पदों पर

    उनके लिए अभावपने का

    कहां कोई मानी है।

     

    कईं बार तो

    मुझे खुद पर भी

    शक होने लगता है

    कि आज़ अभावी हूँ

    तो सोचता रहता हूँ

    अभावी लोगों के दुख भी

    लिखता रहता हूँ

    लेकिन कल अगर

    अभाव से दूर हो जाऊँ

    तो कहीं मैं

    ये बातें करना भी छोड़ जाऊँ

    डर ये मेरे भीतर

    देख देखकर आया है

    दुनियाँ का हाल

    कर देता है जो

    कईं बार मुझे बेहाल।

     

    लोग अक्सर करते हैं

    ये कारनामा

    पहले अपनी समस्याओं के सवाल

    लेकिन बाद में

    संपनता आने पर

    उन्ही समस्याओं को

    कहने लगते हैं बवाल

    क्योंकि ये समस्याऐं

    अब उनकी

    खुद की कहां रहती हैं

    जो अब ये बातें

    उनके समझ में

    आने को रहती हैं।

     

                                       कुमार बन्टी

     

     

     

     

  • तार के टूटने का मतलब

     तार के टूटने का मतलब

    सितार टूटना नहीं होता

    लेकिन सिर्फ जिंदा रहना ही

    जीवन का इस्तेदाद नहीं होता।

                                                       (इस्तेदाद= योग्यता, दक्षता)

     

    जनसंख्या रोज़ बढ़ रही है

    धरती अब छोटी पड़ रही है

    लेकिन हर कोई यहां

    मनवता से भरा

    इंसान नहीं होता।

     

    मुजरिम भी कहां

    जुर्म करने से बाज़ आता है

    जब तक वो कहीं

    गिरफ्तार नहीं होता।

     

     

    दुनियाँ का चलन अब

    इतना बिगड़ गया है

    कि एक भाई

    अपने भाई का गला काटते वक़्त भी

    शर्मसार नहीं होता।

     

    नादानपने में लोग क्याक्या करते है

    जबकि ये बताने की जरूरत नहीं

    कि मोम की  तलवार से

    सूरज कभी

    जख्म्सार नहीं होता।

     

    ये शोर मेरे दिल का

    इतना ज्यादा है कि

    कितना भी लेकर समां

    सब कुछ बयां नहीं होता।

                                                            कुमार बन्टी

  • प्यार जिससे करते हैं हम

    प्यार जिससे करते हैं हम

     प्यार जिससे करते हैं हम

    छुपाते भी उसीसे हैं

    बात जिससे कर पाते नहीं हम

    हमारी सब बातें भी उसीसे हैं।

     

    मिले चाहे दर्द ही

    हमें हर बार लेकिन

    प्यार की ख्वाहिशों में

    हमारी सब उम्मीदजातें भी उसीसे हैं।

     

    दिखावा कर लेते हैं हम

    उससे नाराज होने का

    लेकिन पीछे हम फिर भी

    आतेजातें उसीके है।

     

    इतने बरसों की पढ़ाई में आजतक

    किसी टीचर ने नहीं सुनाई

    लेकिन आजकल ख़ुशीख़ुशी हम

    डांट खातें भी उसीसे हैं।

     

    बाकी जिंदगी तो सही चल रही है यारो

    लेकिन अगर हैं

    तो हमारी सब शिकायतें भी उसीसे हैं।

     

    अरे.., मेरे प्यार से अनजान

    उस पगली को तो ये भी नहीं मालूम

    कि आजकल

    हमारी सब इनायतें भी उसीसे है।

                                                                –   कुमार बन्टी

     

     

     

  • उसकी तस्वीर

     

    बोलने वाले की हर बात में

    मिठास होती है

    अगर सुनने वाले में

    सुनने खातिर

    प्यास होती है।

     

    उसकी तस्वीर निहारके

    ऐसा लगता है मानो

    उससे रोज़ मेरी

    मुलाकात होती है।

     

    ये बात सुनने में बहुत अटपटी लगेगी

    लेकिन सच है

    कि मेरी खुशी और गम

    दोनो का कारण

    उसकी याद होती है।

     

     

    एक बात बहुत चुभती है मुझे

    गुस्सा भी आता है

    कि मेरी छुट्टियों के दिनों में ही

    उसकी जरूरी क्लास होती है।

     

    तभी तो यारों

    उससे मिले बगैर

    अरसा बीत जाता है

    और फिर वो तस्वीर ही

    आखिरी आस होती है।

                                                             –   कुमार बन्टी

  • EMOTIONS

    EMOTIONS

    Emotions

     

    Emotions are only emotions

    And emotions are everything

     

    Emotions are universal

    But emotions are unique also

     

    Emotions can’t be denied

    But all emotions are not good

     

    Emotions exists everywhere

    But real emotions are rare

     

    Emotions make you fool

    But also make you cool

     

     

    Some emotions give you best taste

    But some make your life “a waste’’

     

    Some emotions help life to embrace

    But sometimes make us embarrass

     

    Emotions are found everywhere

    With everyone

    But different is the dare

    To express them with everyone

     

    Emotions are of great importance

    But some have with them grievance

    Emotions sometimes heal us

    But sometimes destroy a great part of us

     

     

     

    Sometimes emotions are pure

    For someone’s sure

    But sometimes dirty

    For people like flirty

     

    Emotions can’t be described as a whole

    Even not only their rise or fall

     

    My emotions are only mine

    And not yours

    Also yours not mine

    Except those are ours….

     

                                                                                                       BY- KUMAR   BUNTY

     

  •         ज्यादा नहीं मुझे तो बस………..

            ज्यादा नहीं मुझे तो बस………..

     

     ज्यादा नहीं मुझे तो बस एक  सच्चा इंसान  बना दे तूँ ।

    एक बार नहीं चाहे हर बार सच में हर बार बना दे तूँ।

     

    आसमां  छूने की ख्वाहिश  मेरी नहीं  मन नहीं मेरा

    मुझे  तो  बस  सही  दिशा  में  उड़ना सिखा दे तूँ।

     

    गलत गति से  गलत राह पे दौड़ना  मैं नहीं चाहता

    मुझे  तो  सही  राह  पे  बस  चलना  सिखा दे तूँ।

     

    सैंकड़ों बरसों के कतरे जीकर भी मेर मन नहीं भरेगा

    मुझे तो बस  आज़ का पूरा दिन  जीना सिखा दे तूँ।

     

    लाखोंकरोड़ों के  झूठे  साथ  का  मुझे  क्या करना

    मुझे तो बस  एक सच्चे साथी का  साथ दिला दे तूँ।

     

    किसीकी बदलती हस्ती को जानकर  मुझे क्या करना

    कौन हूँ क्यों जिंदा हूँ मैं मुझे तो बस ये समझा दे तूँ।

     

    आज़कल दुनिया में  जीतेजीते भी बहुत मरते हैं रब्बा

    इस बंदे को  बस  मरने के बाद  जीना सिखा दे तूँ।

     

                                                                                –   कुमार बन्टी

     

  • जिंदगी  में   मेरी   एक  अपनापन है  आज़कल….

    जिंदगी  में   मेरी   एक  अपनापन है  आज़कल….

     

     जिंदगी  में   मेरी   एक  अपनापन है  आज़कल

    जेब में भले ही गोपाल ठनठन है  आज़कल।

     

    साथ   देने  को   कोई  दूसरा  साथ में नहीं

    बस  अपना बेचारा  साफ मन है आज़कल।

     

    तुम    जब   सुनोगे   तभी   तो  जानोगे     कि

    मेरी   बात  में  कितना   वज़न  है  आज़कल।

     

    मरने  से पहले   ही   मौत   को  देखने  के   बाद

    जिंदगी को जिंदा कर रहा जीवन है आज़कल।

     

    बेफिक्र  ज़माने  की  करतूतें बंदा बता  तो दे

    लेकिन फिक्र उसी ज़माने की अडचन है आज़कल।

     

                                                                   –   कुमार बन्टी

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