तलाश तेरी है
मेरा पता चले
ये नाम मेरा
क्यूं अनजान लगे
ये काम मेरा
इक बोझसा लगे
साथी जो बने
टिक ना सके
चाहा था जिन्हें
कबके ओझल हुए
दिन हो एकसा
यही आस लिए
बीती जा रही
सांस बिन रुके
नज़रों पे कब्जा
कहां हुआ कभी
शिकायत जब हुई
अपनी थी कमी
जुंबा है बेलगाम
नज़रें खुली अपलक
अपनी ही इन्द्रियां
गैर की झलक