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देर है ,अंधेर नहीं!

कहां है वो ,
सबकी नींव धरने वाला!
सबका दाता कहलाने वाला!

कैसे खा गए , वो दरिंदे
उस कच्ची सी कली को,
बहुत ख़रोंचे है, मोम जैसे हाथों पर !
निकली है बाहर आंखें,
मक्खियां है मुंह और नाकों पर!

कितना कराहई होगी वो और
कितना चिल्लाई भी होगी
मगर किन्नर सा समाज ,
अंधा सा,बहरा सा,
अपनी आई पर  ही रोता है।

भगवान को भी बहुत पुकारा उसने,
दयालुता को उसकी ललकारा उसने,
मगर उसको तो देर करनी  ही होती है
क्योंकि उसके दर पर ,
देर है अंधेर नहीं!
    
            ——-मोहन सिंह मानुष

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