खोल अपनी आँख को तू
देख ले ना गौर से,
अब समय है बेटियों का
देख ले तू गौर से।
पुत्र से आगे बढ़ी हैं,
हर तरह से बेटियां।
माँ -बाप को सुख दे रही हैं
आज केवल बेटियाँ।
फिर भी तू संकीर्णता में
जी रहा है बावरे,
चल बदल ले सोच
बेटी को पढ़ा ले बावरे।
——Dr.Satish Pandey