बेटियां

खोल अपनी आँख को तू
देख ले ना गौर से,
अब समय है बेटियों का
देख ले तू गौर से।
पुत्र से आगे बढ़ी हैं,
हर तरह से बेटियां।
माँ -बाप को सुख दे रही हैं
आज केवल बेटियाँ।
फिर भी तू संकीर्णता में
जी रहा है बावरे,
चल बदल ले सोच
बेटी को पढ़ा ले बावरे।
——Dr.Satish Pandey

Comments

8 responses to “बेटियां”

  1. Pt, vinay shastri ‘vinaychand’

    उत्तम

    1. Satish Pandey

      धन्यवाद

  2. Suman Kumari

    बहुत ही सुन्दर

    1. Satish Pandey

      Thank you

  3. Geeta kumari

    बेटियों के प्रति सुंदर सोच

    1. Satish Pandey

      सादर आभार

  4. ह्रदयस्पर्शी

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