मत समझना कि नादान कवि हूँ
बहकी बहकी सी कविता कहूंगा
जिस तरफ बह रही हो हवा
धूल सा उस दिशा को बहूँगा।
राज दरबार का कवि नहीं हूँ
आम जनता बातें कहूंगा
सो न जाए कहीं राज सत्ता,
उस पे कुम्मर सा चुभता रहूंगा।
कोई तारीफ़ झूठी नहीं ,
कोई चुपड़ी सी बातें नहीं,
जो दिखेगा मुझे सच वही
अपनी कविता में कहता रहूंगा।
मत समझना कि नादान कवि हूँ
बहकी बहकी सी कविता कहूंगा
जिस तरफ बह रही हो हवा
धूल सा उस दिशा को बहूँगा।
—— डॉ. सतीश पांडेय
शब्दार्थ –
कुम्मर – यह कुमाउनी का शब्द है जिसका अर्थ घास में मिलने वाला काँटा है। घास काटने वाले के कपड़ों से सरक कर भीतर चला जाता है और यदा कदा चुभता रहता है .