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मानवता को बचाओ..

जरा कम ही शोर मचाया करो
क्योंकि मैंने अक्सर शोर मचाने वालों को
भीड़ का हिस्सा बनते देखा है
जिनका स्वयं का कोई
अस्तित्व नहीं होता है
सिर्फ दूसरों का अनुसरण करते हैं
खुद की होती नहीं कोई पहचान
दूसरों की परछाई बनते हैं
है तेज तुममें तो शोर मत मचाओ
जाओ घर से बाहर
मरती मानवता को बचाओ
जाकर देखो जरा
दुनियाँ की परेशानियों को
अपनी परेशानी छोटी नजर आएगी
जब लगेगी भूँख तो सूखी रोटी भी
स्वादिष्ट बन जाएगी
जैसा बनाकर देती हूँ
चुपचाप खा लो वरना
जाओ किसी हलवाई से ब्याह रचा लो…..

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