मैं जिंदगी जी रहा हूं।
दूसरों के दिए एहसानों,
पर पल रहा हूं।
भटक रहा हूं मैं,
अपने आप से।
घर के रास्ते,
बार-बार टोह रहा हूं।
कहां जाऊं,
मैं किस डगर।
जो भूख मिटा दे,
मेरी इस कदर।
यह थकान जो मैं,
लादकर लाया हूं।
तपती धूप में,
मैं लौट आया हूं
मैं कौन हूं?
पहचाना मुझे।
हां, मैं प्रवासी मजदूर हूं।
रोटी की भूख और पानी की घूंट।
कि तलाश में,
फिर अपने गांव लौट आया हूं।
कहां मिली मुझे,
दो पल चैन की रातें।
आंखों में दुखों का सैलाब लाया हूं।
शहर में गुजारा कर रहा था मैं,
अब तो गुजर आया हूं।
हां, मैं लौट आया हूं।