कविता -वर्ष पुरानी
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आज अचानक,
कुछ खोज रहा था,
कई वर्ष पुरानी कॉपी मिलती है|
मैं साफ किया उसे,
फिर खोल उसे पढ़ने लगा,
पढ़ते-पढ़ते, मै रोने लगा|
उसमें पड़ा गुलाब संग एक खत था,
सूख गया गुलाब पर,
खत यादें ताजा कर डाला,
कॉलेज की मेरी दोस्ती,
खत ने सब कुछ कह डाला|
उसमें कुछ ऐसी बात लिखी थी|
परसों कॉलेज आओगे,
मत लंच बॉक्स लाना,
परसों जन्मदिन तुम्हारा है,
उस दिन को –
यादगार बनाना हम चाह रही हूं|
उस दिन कुछ अपने हाथों से
बनाकर लाऊंगी,
कुछ प्यार भरी बातें होगी
फिर अपने हाथों से खिलाऊंगी|
मैं खत मे नहीं ,बतला सकती,
परसों क्या बनाकर लाऊंगी,
मेरी तरफ से उपहार समझना,
आप कहां और मैं कहां-
हम आपके लिए ,महंगा गिफ्ट नहीं ला पाऊंगी|
मेरे खत का जवाब,
फेंक गिरा के मत देना,
आना जब कल कॉलेज,
मेरे खत का जवाब लिखकर,
मेरी कॉपी में रख कर देना|
बहुत लिखी थी बातें उसमें,
सौ बार कुशलता पूछी थी,
सच में, जिस दिन कॉलेज न जाता था,
कॉलेज में क्या क्या हुई पढ़ाई,
वह सब कुछ लिखती थी,
अनुशासन ,प्यार-भरा ,डाट के संग
एक खत लिखकर-
वह अपनी कॉपी हमें देती थी|
रोते-रोते खत को-
सौ बार चूमा,
खुदा दुआ मै तुझसे करता हूं,
जा उसकी रूह से मेरी यादें ताजा कर दे,
उससे कहना, वह याद किया है,
खत पाके चूमा रोया है,
आज तुम्हारे “ऋषि” का ,फिर से जन्मदिन आया है|
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***✍ऋषि कुमार “प्रभाकर”——