Site icon Saavan

सहधर्मिणी तुम्हारी

आँखों में खटकती, फ़िर दिल में कैसे रहती
जद्दोजहद में गिर गिरकर मैं पग रखती
खुद ही खुद से हारी
कैसे कहूँ मैं हूँ सहधर्मिणी तुम्हारी ।
फ़िजाओ के रूख़ -सा मिज़ाज तेरा बदला
फिर भी धैर्य के संग ठहरा रह मन पगला
लेके उम्मीद सारी,
कैसे कहूँ मैं हूँ सहधर्मिणी तुम्हारी ।
अपेक्षाओं के मोतियों से,गुथी आशाओं की माला
तुम्हे भली जो लगे, उस रूप में खुद को ढाला
छोङी चाह प्यारी,
कैसे कहूँ मैं हूँ सहधर्मिणी तुम्हारी ।
तेरा-मेरा रिश्ता, रहे हमेशा सही- सलामत
हमसे जुङी है दो कुल, परिवार की चाहत
अपने अहम् को भी वारी,
कैसे कहूँ मैं हूँ सहधर्मिणी तुम्हारी ।

Exit mobile version