हाथ

मैंने जितना हाथों को देखा,
उतना चेहरा नहीं देख पाई;
जब उसने अपनी उँगलियाँ
मेरी उँगलियों में उलझाईं,
मुझे मेरा चेहरा नहीं दिखा;
बस ये महसूस हुआ
कि वो उगते हुए सूरज सा है;
उसका ताप महसूस हुआ
मगर इतना नहीं की मैं जल जाऊँ।
चेहरा महसूस करने के बाद
मैंने अपने हाथों को देखा,
उस छुअन से हल्का कंपकपाते हुए,
मगर इतने बल से उसकी हथेली पकड़े हुए
की फिर जाने ना पाए।
मैंने सुबह उठ कर उबासी ली
हाथ ने मेरे मुँह को अपनी गर्त में लिया,
मैंने एक बार फिर चेहरे को महसूस किया,
मगर देख नहीं पाई।
मुझे जितने अच्छे से मेरे हाथ मालूम है
उतना मैं चेहरे को नहीं जानती;
मैंने लोगों के चेहरों को झूठ बोलते देखा,
हाथ सच पर डटे रहे।
मैंने हाथों का ढीलापन,
या खिंची हुई नसें पढ़ना सीखा,
चेहरा पढ़ना नहीं सीख पाई।
-श्रेया

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