“पतझड़”

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मासूम निगाहें पलकों पर आश सजोयें अब भी राह ताकती होंगी,
सबके खो जाने के गम में छुप – छुप  कर  दर्द  बाँटती  होंगी,

वो यादें बड़ी सुनहरी है उनको मैं बार बार दोहराता हूँ,
उनको हर वक्त याद कर कर ख्वाबों में गुम हो जाता हूँ,

हर वक्त इसी का इन्तजार कि कोई तो उंगली थामेगा,कोई फिर नन्हें पांवो को  सही  राह दिखलायेगा,
हर गलती पर पीछे मुड़ता की फिर कोई डाँट लगायेगा, फिर कोई बाहों में भर गालों को सहलायेगा,

वक्त की इन बंदिशों पर विजय पाना है मुझे,यादों के कटोरे से वो हंसी पल चुराना है मुझे,
एक बार फिर उसी बचपन में जाना है मुझे,पतझड़ में भी बहार सा मौसम लाना है मुझे,

गुजरते वक्त नें जब ली थी फिर से अंगड़ायी,चंद सिक्कों की कीमत फिर मुझे थी याद आयीं,
बस गुजारिश है मेरी रब से यहीं कि फ़कत में कुछ वक्त लिख दे,

सारी दौलत के बदौलत मेरा वो हंसी वक्त लिख दे,ख्वाबों के संसार में मेरा भी इक शहर लिख दे,
गर नहीं पूरी हो रही है  मेरी छोटी सी दुआ तो मेरी झोली में रंजिशों का  कहर  लिख दे ,
…सारी जिन्दगानी की बदौलत मुझे एक नयीं सहर लिख दे

Comments

One response to ““पतझड़””

  1. महेश गुप्ता जौनपुरी Avatar

    बहुत बढ़िया रचना

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