मुड़े कागज़ की तरह

मुड़े कागज़ की तरह माथे की लकीरें बन गई है
मेरी किस्मत की हाथों की लकीरों से ठन गई है
अपने हिस्से की गिरवी रखी उदासी को
देख अब उस पे कितनी सूद चढ़ गई है
माना हस्ती अपनी खुद की न कतरे से जुदा
खुद ये कतरा मेरा आईना बन गई है
मेरी कलम से निकली हुई स्याही यूँ हुई खफा
ज़ीस्त अपनी कोई बिगड़ी कहानी बन गई है
क्या है अर्ज़ तेरी कौन सुनेगा ‘अरमान’
ख्वाइशें खुद बखुद खौफ बन गई है
मुड़े कागज़ की तरह माथे की लकीरें बन गई है
मेरी किस्मत की हाथों की लकीरों से ठन गई है

राजेश ‘अरमान’

Comments

2 responses to “मुड़े कागज़ की तरह”

  1. Abhishek kumar

    Good

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