मंज़िलें कुछ इस कदर

मंज़िलें कुछ इस कदर हमसे जुदा हो गई है
ये हमारे वास्ते तो बस ख़ुदा हो गई है

अच्छे दिन आने वाले है बस सुनते रहे
या तो नई मुश्किलों की इब्तेदा हो गई है

इन परिंदों को क्या रोक सकेगा आसमां
हवायें इन की खातिर गम़दीदा हो गई है

उन्हें क्या गुमाँ जो नौटंकी में माहिर हो
उनके वास्ते गुस्ताखी भी, इक अदा हो गई है

सीधे रस्ते से मंज़िल पाना होता है आसां
रास्तें सीधे रहे पर , मंज़िल ही पेचीदा हो गई है

मंज़िलों को कैसे किनारा मिलता ‘अरमान’
मंज़िलें जब खुद तूफाँ पे फ़िदा हो गई है

राजेश’अरमान’
गम़दीदा= दु:खित, व्यथित

Comments

2 responses to “मंज़िलें कुछ इस कदर”

  1. राम नरेशपुरवाला

    Good

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