अपना बचपन की सत्य गाथा
सुंदर सा परिवार हमारा
छोटा शहर हाथरस था प्यारा
पांच भाई और हम दो थी बहना
मात – पिता के हम थे गहना
छोटी थी पर बहुत चंचल थी
लाड़ – प्यार का नहीं था घाटा
जो कुछ भी था घर में आता
मिल – बांटकर सब संग में खाता
सत्संग भी था सबको प्यारा
नहीं थी कोई भी चिंता फिक्र
जितना जी में था उतना ही पढ़ना
नहीं किसी से पीछे रहना
हरदम बढ़िया नम्बर पाना
बिन ट्यूशन ही पास हो जाना
समस्या हो तो भाई से पढ़ना
जब कर ली पूरी पढ़ाई
एक बार दिल्ली घूमने को आई
बस दिल्ली तो हम सबको भाई
छोड़कर शहर वो छोटा सा
कर ली हमने बस यही कमाई
बचपन के संस्कार यहाँ पर
काम हमारे आये जो हम दिल्ली
वालों के भी थे मन को भाये
पर गम है तो बस इतना सा
गाँव में हम नाम से जाने जाते थे
और यहाँ मकान नंबर से हम
पहचाने जाते हैं
गांव में इक पहचान थी अपनी
वहाँ नाम से पुकारा जाता थे
यहाँ अगले वाले बगल वाले
ऊपर वाले नीचे वाले
कहकर हम जाने जाते हैं
बेशक साधन संपन्न हैं यहां
पर सब साथ रहते थे हम
कांटा भी चुभ जाता था कहीं
अपनों के रहते चुभन का
एहसास तक ना होता था
काश वो छोटा सा ही घर था
उसमें भी सुकून होता था
रीता जयहिंद
9717281210
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