देखना है की हिस्सों में कैसे बँट पाउँगा मैं। इक बूढ़ा शज़र हूँ लगता है कट जाऊंगा मैं।। ‘

देखना है की हिस्सों में कैसे बँट पाउँगा मैं।
इक बूढ़ा शज़र हूँ लगता है कट जाऊंगा मैं।।

मुझे सहारा देने में दिक्कतें तो है बच्चों को।
ख़ामोश ही रहूँगा की जब थक जाऊंगा मैं।।
,
सोचा नहीं था की मुझपे भी होगी पत्थर बाजी।
जब इक फल जैसा शाख पे पक जाऊंगा मैं।।
,
ज़मी ज़ायदाद तकसीम हुए तजुर्बे कौन रखेगा।
वक़्त है पूँछो अफसोस होगा जब मर जाऊंगा मैं।।
,
रूह भी मेरी माँगेगी तुम्हारी सलामती की दुआएँ।
रोना नहीं जब मौत की रस्सी से बन्ध जाऊंगा मैं।।
@@@@RK@@@@

Comments

8 responses to “देखना है की हिस्सों में कैसे बँट पाउँगा मैं। इक बूढ़ा शज़र हूँ लगता है कट जाऊंगा मैं।। ‘”

  1. Kumar Bunty Avatar
    Kumar Bunty

    NAYAB

  2. Ramesh Singh Avatar
    Ramesh Singh

    Thanks

    1. Ramesh Singh Avatar
      Ramesh Singh

      Thanks

  3. Dinesh Avatar

    awesome .., like a professional .., great work

    1. Ramesh Singh Avatar
      Ramesh Singh

      Thanks

  4. Abhishek kumar

    Wow

Leave a Reply

New Report

Close