दर्द चोट आसूँ जख़्म अब मरहम चाहिए।
सफ़र में क्या कहें हमको हमदम चाहिए।।
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मेरी मुस्कुराहट पर हैरत क्यूँ करते हो तुम।
बोल दो आँखों का मंजर नम नम चाहिए।।
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अब तक जिन्दा हूँ सुनो मौत भी फरेबी है।
जिंदगी नादान को आवाज़ छमछम चाहिए।।
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वफ़ा करो मगर वफ़ा की उम्मीद न रखना।
रखो अग़र ख़ुशी की जगह ग़म ग़म चाहिए।।
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जब दिल में दर्द हो बातों से फिरआँसू आएं।
सच में कहूँ तो ऐसा मौसम कम कम चाहिए।।
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कही रात है ख़ामोशी है तन्हाई है अँधेरा है।
कही मेहफिल सजी है रौशनी चमचम चाहिए।।
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दर्द चोट आसूँ जख़्म अब मरहम चाहिए।
Comments
8 responses to “दर्द चोट आसूँ जख़्म अब मरहम चाहिए।”
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NICE
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Thanks
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अच्छा प्रयास
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धन्यवाद
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bahooot khooob
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Thanks
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वाह बहुत सुंदर रचना
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Nice one
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