इक जमानें मे सच है शज़र हुआ था मैं।
जानें कितने परिंदों का घर हुआ था मैं।।
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अपनी छाह में बच्चों को खेलता देखके।
जरूर ही जमाने से बेखबर हुआ था मैं।।
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मेरे सायें में बीती थी हाँ वैसे तो इक सदी।
याद है की अख़बार में खबर हुआ था मैं।।
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पर राह ए जिंदगी में इक मोड़ ऐसा देखा।
सबने छोड़ा जब शाख़ ए बेसमर हुआ था मैं।
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आखिरी वक़्त जब चली थी मुझपे आरिया।
ख़ून नहीं था मुझमे पर तरबतर हुआ था मैं।।
@@@@RK@@@@
“इक जमानें मे सच है शज़र हुआ था मैं”
Comments
3 responses to ““इक जमानें मे सच है शज़र हुआ था मैं””
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Good
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वाह
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Wow
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