मुक्तक

सियासी आदमी हरगिज़ तुम्हारा हो नहीं सकता।
कोई भी मतलबी दुःख में सहारा हो नहीं सकता।
जमीं ग़र रो रही है तो सुनो बस बेबकूफ़ी है-
फ़लक़ का है जमीं का तो सितारा हो नहीं सकता।

ठा. कौशल सिंह✍️

Comments

4 responses to “मुक्तक”

  1. Neha Avatar

    True…each word is marvelous

  2. Abhishek kumar

    Nice

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