मैं ख़ुद को ख़ुद से बाहर निकालना चाहता हूं,
मैं कुछ करके दिखाना चाहता हूं।
कोई मेरा साथ दे ना दे,
मैं ख़ुद का साथ ख़ुद पाना चाहता हूं।
मेरा दिल बहुत डरता है,
कभी कभी
दिमाग भी उलझता है।
कभी कभी
दिल और दिमाग का टकराव भी हो जाता है।
कभी कभी
सहना हद से बाहर हो जाता है।
मैं दोनों का मसला सुलझाना चाहता हूं।
मैं ख़ुद को ख़ुद से बाहर निकालना चाहता हूं।
मनप्रीत गाबा
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