अंत ही आरंभ है

बड़ रहा अधर्म है, बड़ रहे कुकर्म हैं।
इनके जवाब में आज वो उठ खड़ी।।
तोड़ कर सब बेड़ियाँ, हुंकार है भरी।
अपने स्वाभिमान के लिए है वो उठ खड़ी।
संयम त्याग कर, ललकार है भरी।
ललकार प्रचंड है, तांडव का आरंभ है।
धैर्य का टूटना आरंभ है विनाश का।
विनाश ये प्रचंड है, भयावह अब अंत है
अंत ही आरंभ है, यही तो प्रसंग है।।।

Comments

6 responses to “अंत ही आरंभ है”

  1. ashmita Avatar
    ashmita

    आपके शब्दों की झंकार कविता के अर्थ को काफ़ी बेहतर तरीक़े से प्रस्तुत करती है। beautiful poem

    1. Ekta Vyas Avatar

      आपका बहुत बहुत धन्यावाद

  2. महेश गुप्ता जौनपुरी Avatar
    महेश गुप्ता जौनपुरी

    वाह बहुत सुंदर रचना ढेरों बधाइयां

  3. राम नरेशपुरवाला

    Good

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