तराजू के दोनों पलड़ों पर रखकर आंकते देखा,
वजन प्यार का फिर भी मेरे कम भाँपते देखा,
बन न पाया था किसी साँचे से जब आकार मेरा,
के लेकर हाथों में फिर मिट्टी को नरम नापते देखा,
ढूंढते थक हार कर बैठ गए जब मिलने वाले सारे,
नज़रों से गढ़ाये नज़रों को ही फिर यूँ काँपते देखा॥
राही अंजाना
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