राही अंजाना, Author at Saavan's Posts

परिंदा

सोये हुए मेरे अरमानों को उठाने आया था कोई, कल रात मुझको चुपके से जगाने आया था कोई, के एक उम्र बीत गई थी अँधेरी चार दिवारी में मेरी, खुले आसमाँ में मुझको सैर कराने आया था कोई, हार कर यूँही छोड़ दिए थे जब हाथ पैर अपने मैंने, तब परिंदे सा हौसलों के पंख लगाने आया था कोई॥ राही अंजाना »

सरकार

खबर मिली है के सबको ही ज़रा खबरदार रहना है, अपनों को अपनों से ही सम्भलकर मेरे यार रहना है, करली बहुत सी बेवकूफियां तुमने अब छोड़ो सबको, सुनो इस दुनियां में तुम्हें थोडा तो समझदार रहना है, गुमराह करने में लगें हैं एक दूसरे को सब ऐसे मानो, के बनाकर उन्हें जानो खुद की यहॉं सरकार रहना है।। राही अंजाना »

अच्छा लगे

बात इस दिल की दिल में रख लो तो अच्छा लगे, सपनों में ही सही मुलाकात रखलो तो अच्छा लगे, देखकर तुमको मैं ज्ञानी गूढ़ भी मूढ़ ही हो जाता हूँ, सुनो बातों की तुम्हीं शुरुवात करलो तो अच्छा लगे, तकलीफें बहुत हैं ज़माने में कदम कदम पर जाना, मेरे हाथों में तुम्हीं अपना हाथ रख लो तो अच्छा लगे।। राही अंजाना »

उम्मीदों का ठेला

उम्मीदों का ठेला लेकर रोज निकल जाता है कोई, कागज़ कोरे जेब में लेकर रोज निकल जाता है कोई।। कलम कीमती है कितनी ये भटक राह में जाना है, तभी बैग में स्याही लेकर रोज निकल जाता है कोई।। राही अंजाना »

उम्मीदों का ठेला

उम्मीदों का ठेला लेकर रोज निकल जाता है कोई, कागज़ कोरे जेब में लेकर रोज निकल जाता है कोई।। कलम कीमती है कितनी ये भटक राह में जाना है, तभी बैग में स्याही लेकर रोज निकल जाता है कोई।। राही अंजाना »

किश्तें बाकी रह गई

गलतफहमियों की कितनी और किश्तें बाकी रह गईं, इंसानों की कितनी और देखनी किस्में बाकी रह गईं।। नज़र-नज़ारे दिल-दिमाग और जुदाई सबपे लिखा मैंने, कहना मुश्किल है के और कितनी नज़में बाकी रह गईं।। राही अंजाना »

आँखे

बन्द कर लो बेशक ऑंखें मर्ज़ी तुम्हारी सही, तुम्हारी आँखों से मुतासिर आँखें हमारी सही।। राही अंजाना मुतासिर – प्रभावित »

माहिर

जितना सुलझाती है उतना ही उलझाती है मुझको, उधेड़कर पहले खुद सिलना सिखलाती है मुझको, खोलकर दिल को जोड़ने में माहिर बताने वाली वो, सच को रफू कर बस झूठ ही दिखलाती है मुझको।। राही अंजाना »

रियाज़

सात सुरों के संगम का एक जैसा सबको, रियाज़ कराया जाता है, फिर आपस में ही एक दूजे में क्यों सबको, इम्तियाज़ बताया जाता है, जब ज़मी आसमां चाँद सितारे हम सबसे, कोई भेद न रखते हैं, फिर दो दिल जब मिलना चाहें तो इसमें, क्यों एतराज़ जताया जाता है।। राही अंजाना »

सहारे

समन्दर के कभी दो किनारे नहीं मिलते, हमसे तो आकर ही हमारे नहीं मिलते, बात ये है के विचारधारायें भिन्न हैं सभीकी, तभी तो ढूढे से किसी को सहारे नहीं मिलते।। राही (अंजाना) »

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